
बिखरते रिश्तों पर खाकी का मरहम
पारिवारिक विवाद सुलझाने के लिए चूरू पुलिस का अनूठा प्रयोग. थाने की चौखट पर कार्रवाई ही नहीं, संवाद से समाधान की पहल, महिला अधिकारिता विभाग के साथ मिलकर चूरू पुलिस कर रही पारिवारिक विवादों में टूट चुके परिवारों की काउंसलिंग.
चूरू की रेगर बस्ती निवासी काजल और तारानगर क्षेत्र के भालाऊ ताल निवासी विशाल की शादी करीब तीन वर्ष पहले हुई थी. शुरुआती एक साल तक दोनों का दांपत्य जीवन सामान्य रहा, मगर उसके बाद छोटी-छोटी बातों को लेकर विवाद होने लगा. जल्द ही यह पारिवारिक विवाद गंभीर मतभेदों में बदल गया और हालात ऐसे बन गए कि काजल पति का घर छोड़कर अपने पीहर में आकर रहने लगी.
करीब दो साल तक दोनों अलग रहे, इसी दौरान काजल और विशाल के बच्चे का भी जन्म भी हुआ. परिवार के स्तर पर कई बार सुलह के प्रयास किए गए, मगर सफलता नहीं मिली. लंबे समय से चले आ रहे इस विवाद के समाधान के लिए काजल गत 7 सितंबर को चूरू के महिला थाना स्थित महिला सुरक्षा एवं सलाह केंद्र पहुंची और सहायता के लिए प्रार्थना पत्र दिया. महिला थाना अधिकारी कुसुमलता के सानिध्य में एएसआई कविता, काउंसलर धर्मेंद्र कुमार, कविता मीणा और रजनी ने पति-पत्नी से अलग-अलग और आमने-सामने बातचीत कर विवाद के कारणों को समझा और समझाइस की. कई बार की काउंसलिंग के बाद काजल और विशाल पुराने मतभेद भुलाकर दोबारा साथ रहने के लिए सहमत हो गए और अपने दो वर्षीय बच्चे के साथ नए सिरे से पारिवारिक जीवन की शुरुआत की.
काजल और विशाल इकलौते नहीं हैं. चूरू में महिला सुरक्षा एवं सलाह केंद्र की काउंसलिंग ने ऐसी ही कई बिखरती दांपत्य की कहानियों को रिश्तों की नई डोर में पिरोया है. पुलिस की इस पहल ने यह भी साबित किया है कि रिश्तों में आई दरार को अक्सर लोग अंत मान लेते हैं, मगर सही समय पर मिली समझाइश और संवाद बिखरते परिवार को फिर से जोड़ा सकता है.
ऐसे ही एक बिखरा हुआ परिवार देपालसर रोड स्थित कच्ची बस्ती के रहने वाले सुलोचना और अजीत का भी था. तीन साल पहले दोनों के बीच पारिवारिक विवाद हुआ और दोनों अपनी झोपड़ी छोड़कर अलग-अलग राह पर चल पड़े. करीब तीन महीने पहले सुलोचना और अजीत का मामला महिला सुरक्षा एवं सलाह केंद्र पहुंचा. केंद्र प्रभारी राधी सेन और सलाह एवं परामर्शदाता सुमित्रा कुमारी ने दोनों पक्षों से बातचीत कर विवाद सुलझाने के प्रयास शुरू किए.
अजीत असम से लौटने को तैयार नहीं था, मगर लगातार समझाइश के बाद गत 7 अगस्त को वह चूरू लौट आया. इसके बाद पति-पत्नी की कई दौर की काउंसलिंग हुई. 21 अगस्त को दोनों ने पुराने मतभेद भुलाकर फिर साथ रहने का फैसला किया. तीन साल से जिस घर में चूल्हा नहीं जला था, वहां फिर से खुशियों की आहट सुनाई देने लगी. जिस झोपड़ी के दरवाजे पर लंबे समय से ताला लटका था, वह खुला तो सिर्फ एक घर का दरवाजा नहीं खुला, बल्कि बिखरे परिवार के दोबारा बसने का रास्ता भी खुल गया.
पति-पत्नी के बीच हुए विवाद के बाद करीब तीन साल से अलग रह रहे सुलोचना और अजीत जब दोबारा साथ आए तो सबसे ज्यादा खुशी उनके मासूम बच्चे के चेहरे पर दिखाई दी. मां और पिता को एक साथ देखकर बच्चे के चेहरे पर खिली मुस्कान ने उन तीन सालों के दर्द को जैसे पीछे छोड़ दिया.
चूरू जिला पुलिस और महिला अधिकारिता विभाग के संयुक्त तत्वावधान में पारिवारिक बैठकें आयोजित कर आपसी मनमुटाव दूर करने और पारिवारिक विवादों का निस्तारण करने की पहल की यह बुनियाद बुनी जा रही है. पुलिस अधीक्षक निश्चय प्रसाद एम. के निर्देशन में चल रही इस पहल के तहत परिवारों को एक मंच पर बैठाकर उनकी समस्याएं सुनी जाती हैं. आपसी मतभेदों को समझने और सहमति से समाधान तलाशने का प्रयास किया जाता है.
इस नवाचार का उद्देश्य विवादों को बढ़ने से रोकना, परिवारों के बीच संवाद कायम करना और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करना है. यह पहल इस बात को रेखांकित करती है कि पारिवारिक विवादों के समाधान में पुलिस, प्रशासन और सामाजिक संगठनों की समन्वित भूमिका उपयोगी हो सकती है.
गरीब परिवारों के लिए वरदान है यह कार्यक्रम
‘‘पारिवारिक बैठक कार्यक्रम के पारिवारिक विवाद के कारण अलग हुए जोड़ों का फिर से साथ रहने का मौका दिया जा रहा है. काउंसलिंग और समझाइस के जरिए पारिवारिक सामंजस्य बढ़ाने पर जोर दिया जाता है. कानूनी विवादों में अपना समय और धन गंवाने वाले गरीब परिवारों के लिए यह कार्यक्रम नया वरदान साबित हो रहा है.’’

‘‘इस अभियान के दौरान महिलाओं को राजकॉप ऐप, महिला बीट अधिकारी, कालिका पेट्रोलिंग, वन स्टॉप सेंटर, महिला हेल्पलाइन और घरेलू हिंसा से संबंधित सहायता व्यवस्थाओं के बारे में जागरूक किया जाता है. किसी भी तरह की समस्या या संकट की स्थिति में महिला हेल्पलाइन 112, 181 और 1090 सहित उपलब्ध सहायता माध्यमों से संपर्क करने की जानकारी भी जाती है.’’
चूरू पुलिस की यह पहल सिर्फ विवाद सुलझाने तक सीमित नहीं है बल्कि उसका संदेश इससे कहीं बड़ा है. हर विवाद का अंत परिवार के टूटने से नहीं होना चाहिए. कई बार रिश्तों को बचाने के लिए कानून की कार्रवाई से पहले संवाद की जरूरत होती है. जब खाकी की सख्ती के साथ संवेदना और समझाइश जुड़ती है तो बंद दरवाजे खुल सकते हैं, बुझा चूल्हा फिर जल सकता है और बिखरा परिवार फिर से एक छत के नीचे लौट सकता है.