
अजब सिंबल की गजब कहानी
जेन जी को समझ नहीं आते ‘मूसल-खरल’ जैसे चुनाव चिह्न, अब भी चल रहे हैं दशकों पुराने निशान
राजस्थान के निकाय चुनाव में मतदाता इस बार सिर्फ प्रत्याशियों के नाम नहीं, उनके अजब-गजब चुनाव चिह्न भी याद रखेंगे. कहीं चिमटा है, कहीं चप्पल, कहीं जुराब, तो कहीं हरी मिर्च और आईसक्रीम. मगर इन रोचक चुनाव चिह्नों के बीच एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो रहा है कि क्या चुनावी प्रतीकों की यह दुनिया अब बदलने का वक्त आ गया है?
दरअसल, चुनाव चिह्नों की सूची में कई ऐसे प्रतीक आज भी शामिल हैं जो कई दशकों पुराने दौर से चले आ रहे हैं. पुराना टेलीविजन, पुराना टेलीफोन, स्लेट, कुंडी, लेटर बॉक्स, मूसल-खरल, चक्की और हाथ गाड़ी जैसे प्रतीकों से जेन जी के कई मतदाता परिचित ही नहीं हैं. ऐसे में सवाल है कि जिस चुनाव चिह्न का मकसद मतदाता को प्रत्याशी की पहचान आसान बनाना है अगर नई पीढ़ी ही उसे पहचानने में उलझ जाए तो क्या ऐसे प्रतीकों में बदलाव जरूरी नहीं?
देखा जाए तो आज के जेन जी मतदाता स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, डिजिटल पेमेंट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में बड़े हुए हैं, ऐसे में उन्हें पुराने प्रतीक अजीत नजर आते हैं. राजस्थान के निकाय चुनावों ने एक बार फिर चुनाव चिह्नों की इस दिलचस्प दुनिया को चर्चा में ला दिया है.
चिमटा, चप्पल, जुराब...चुनाव मैदान में अजब-गजब पहचान :
राजस्थान में 309 नगरीय निकायों के चुनाव हो रहे हैं जिनमें 36 हजार 365 उम्मीदवार चुनाव मैदान में डटे हैं. भाजपा, बसपा, आप, माकपा, एनपीपी और कांग्रेस जैसी मान्यता प्राप्त पार्टियों के उम्मीदवारों को अपने तय चुनाव चिह्न मिलते हैं. भाजपा का कमल, कांग्रेस का हाथ और आम आदमी पार्टी का झाड़ू, बसपा का हाथी, माकपा का हंसिया-हथौड़ा और एनपीपी का किताब सिंबल मतदाताओं के लिए पहले से पहचाने हुए प्रतीक हैं मगर निर्दलीय उम्मीदवारों को सिंबल बांटने की बारी आती है तो मामला खूब रोचक हो जाता है क्योंकि उन्हें चुनाव आयोग की ओर से निर्धारित जूता, चप्पल, चिमटा, चक्की, चारपाई, कैंची, सिलाई मशीन, हारमोनियम, ट्रक और पानी की टंकी जैसे प्रतीकों में से कोई चुनाव चिह्न चुनना होता है.
यह प्रक्रिया पहले आओ, पहले पाओ के सिद्धांत पर चलती है ऐसे में सबसे आखिरी में आने वाले उम्मीदवारों को जूता, चप्पल, जुराब जैसे चुनाव चिन्ह मिलते हैं. चुनावी विश्लेषकों के अनुसार, जूता और चप्पल जैसे चुनाव चिह्न लेने से कई उम्मीदवार बचते हैं. वजह साफ है- चुनाव में हर उम्मीदवार अपने प्रतीक के साथ एक सकारात्मक और प्रभावशाली पहचान बनाना चाहता है.
निकाय चुनाव में चुनाव चिह्न की अहमियत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम अपने निर्धारित चुनाव चिह्न पतंग के लिए हाईकोर्ट तक पहुंच गई. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जमील खान ने याचिका दायर कर निकाय चुनाव में पार्टी उम्मीदवारों को पतंग चुनाव चिह्न आवंटित करने की मांग की.
देखा जाए तो प्रत्याशी अपने चुनाव चिह्न के हिसाब से नारे, गीत और पोस्टर तैयार करते हैं. मतदाताओं से बार-बार कहा जाता है कि फलां निशान का बटन दबाना है. इसलिए उम्मीदवार ऐसा प्रतीक चाहते हैं जो आसानी से याद रहे और जिसका प्रचार करना भी आसान हो. मामला अदालत तक पहुंचने के बाद यह साफ हो गया कि चुनाव चिह्न सिर्फ मतपत्र पर बनी तस्वीर नहीं है, यह पार्टी और उम्मीदवार की राजनीतिक पहचान भी है.
खाने-पीने की चीजें भी चुनावी निशान :
निर्वाचन आयोग की ओर से तय मुक्त चुनाव चिह्नों की सूची किसी बाजार की खरीदारी सूची से कम दिलचस्प नहीं है. इसमें खाने-पीने और रोजमर्रा की कई चीजें शामिल हैं. नाशपत्ती, कटहल, भिंडी, तरबूज, अखरोट, सेब, हरी मिर्च, आईसक्रीम, अंगूर और फूलगोभी जैसे चुनाव चिन्ह इस श्रेणी में आते हैं.
खाने-पीने ही नहीं पहनने की चीजें भी चुनावी मैदान में नजर आ रही हैं. चप्पल, जुराब, हेलमेट, कोट, चूड़ियां और मोतियों का हार जैसे चुनाव चिह्न प्रत्याशियों को मिले हैं.
