
हथकड़ी नहीं, भरोसे का हाथ
जरायम पेशे के दल-दल में धंसे लोगों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए झालावाड़ पुलिस की अभिनव पहल. सलाखों से नहीं पुलिस ने सहारे से बदल दी आदतन अपराधियों की जिंदगी.
हाथों में रोजगार, बच्चों के लिए स्कूल, सिर पर अपनी छत और अपराध की दुनिया से हमेशा के लिए नाता तोड़ने का मजबूत संकल्प. झालावाड़ पुलिस का ‘नया सवेरा’ अभियान उन जिंदगियों में उम्मीद की नई रोशनी भर रहा है, जिन्हें कभी अपराध और अभाव का अंधेरा अपनी गिरफ्त में लिए हुए था. यह अभिनव पहल बता रही है कि अपराध की दुनिया से लोगों को बाहर निकालने के लिए सिर्फ हथकड़ी और सलाखें काफी नहीं होतीं, कई बार उन्हें एक भरोसेमंद हाथ, सम्मानजनक रोजगार और बेहतर जिंदगी का अवसर भी देना पड़ता है. इस अभिनव पहले के सारथी बने हैं भारतीय पुलिस सेवा के 2018 बैच के पुलिस अधिकारी अमित कुमार जो 23 जुलाई 2025 को हाडौती की हरित भूमि झालावाड़ में पुलिस अधीक्षक बनकर आए थे. अमित कुमार की ओर से शुरू किया गया ‘नया सवेरा’ केवल एक पुनर्वास कार्यक्रम नहीं है, यह उस पुलिसिंग की मिसाल है, जो अपराध के बाद सजा देने के बजाय अपराध पैदा करने वाली परिस्थितियों को बदलने की कोशिश करती है. झालावाड़ जिले में जरायम की दुनिया में डूबी बस्तियों में इस बदलाव की शुरूआत हो चुकी है.
जिले के चांदियाखेड़ी गांव की लाडबाई जैसे कई परिवारों को पुलिस की इस पहल का संबल मिला है. लाडबाई का जीवन शायद अपराध और अभावों के उस दुष्चक्र में ही गुजर जाता, जिसमें वह बचपन से पली-बढ़ी थी. पहले पिता की आपराधिक दुनिया और फिर शादी के बाद ससुराल की आपराधिक पृष्ठभूमि वाली जिंदगी ने उसे कभी अपने घर और सम्मानजनक जीवन का सपना देखने का मौका ही नहीं दिया. उसके तीन बेटे भी धीरे-धीरे उसी रास्ते की ओर अग्रसर होने लगे थे मगर दो साल पहले जब झालावाड़ के पुलिस अधीक्षक अमित कुमार ने उनके पुनर्वास के लिए नया सवेरा कार्यक्रम की शुरुआत की तो उनके सपनों को जैसे पंख लग गए. फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार पुलिस उनकी बस्ती में किसी को गिरफ्तार करने नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी की दिशा बदलने आई थी. इस पुनर्वास कार्यक्रम से जुड़कर लाडबाई के तीनों बेटे अपराध त्याग की शपथ ले चुके हैं और लाडबाई के साथ उनकी पुत्रवधुएं काजल और महाजन बाई भी राजस्थान टेक्सटाइल्स मिल (आरटीएम) भवानीमंडी में रोजगार से जुड़ गई हैं. पुलिस अधीक्षक की पहल पर 18 अगस्त को जब लाडबाई को ग्राम पंचायत पिपलोद की ओर से मकान के लिए आवासीय पट्टा जारी किया गया तो उसकी खुशी का कोई ठोर ठिकाना नहीं था. उनके पक्के घर का सपना अब प्रधानमंत्री आवास योजना में पूरा हो सकेगा.
लाडबाई अकेली नहीं है. बिरियाखेड़ी के मनोज कुमार की कहानी तो इस बदलाव को और भी गहरे अर्थ देती है. मनोज 5 भाईयों और 6 बहनों में से एक हैं. पिता की मृत्यु हो चुकी है और उनके चारों भाई आपराधिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं. ऐसी विकट परिस्थितियों में भी मनोज ने ग्रेजुएशन तक पढाई की मगर नौकरी हासिल नहीं कर पाए. नौकरी को सपना छोड़कर वो एक ई-मित्र सेंटर पर मजदूरी करने लगे मगर दो साल पहले जब उन्हें झालावाड़ पुलिस अधीक्षक की ओर से उनके समुदाय के लिए चलाए जा रहे पुनर्वास कार्यक्रम का पता चला तो इससे जुड़कर उन्होंने फिर से सरकारी नौकरी की तैयारी शुरू की. मनोज ने कठिन मेहनत और पुलिस के सहयोग व प्रेरणा से होमगार्ड परीक्षा पास कर सभी प्रक्रियाऐं सफलता पूर्वक पूर्ण की हैं. मनोज झालावाड़ जिले में कंजर समुदाय के इकलौते युवा हैं जिनका चयन होमगार्ड में हुआ है.

नारायणपुरा की अंगूरी बाई की जिंदगी भी कभी अपराध, गरीबी और अभावों से घिरी हुई थी. पति के खिलाफ कई आपराधिक मामले थे और आर्थिक संकट ने बच्चों को स्कूल से बाहर कर दिया था. झालावाड़ पुलिस का संबल नहीं मिलता तो शायद अंगूरी खुद भी अपराध के दल-दल में फंस जाती. झालावाड़ पुलिस के पुनर्वास कार्यक्रम से प्रेरित होकर अंगूरी आरटीएम रोजगार केंद्र से जुड़ी और खुद व पति के साथ अपराध की दुनिया त्यागने की शपथ ली. अब स्कूल छोड़ चुके बच्चे वापस स्कूल जाने लगे हैं. अंगूरी ने रोज दो किलोमीटर पैदल चलकर रोजगार का प्रशिक्षण लिया और आज वह कुशल श्रमिक की एल 2 ग्रेड में शामिल है. अंगूरी अपनी मेहनत से अब खूब पैसा कमा रही है, उसके बैंक खाते में 30 हजार से अधिक रूपए जमा हैं. अंगूरी को ग्राम पंचायत रूंडवाल की ओर से घर बनाने के लिए आवासीय पट्टा भी जारी हुआ है.
तीतरवासा गांव के श्यामलाल (बदला हुआ नाम) के खिलाफ चोरी, डकैती की योजना, अवैध शराब व आर्म्स एक्ट के 16 आपराधिक प्रकरण पूर्व के दर्ज हैं. उनके खिलाफ आखिरी मामला 2024 में दर्ज हुआ था मगर इसके बाद उन्होंने झालावाड़ पुलिस के नया सवेरा पुनर्वास कार्यक्रम में जुड़कर अपराध त्याग की शपथ ली है. अब वो आरटीएम में नियमित रोजगार से जुड़कर कुशल श्रमिकों की एल 3 ग्रेड में शामिल हो चुके हैं. श्यामलाल को ग्राम पंचायत तीतरवासा की ओर से आवासीय पट्टा भी जारी हुआ है.
श्यामलाल कहते हैं – ‘‘अगर पुलिस का यह सहयोग मुझे बचपन में मिल जाता तो आज मेरा परिवार खुशहाली और समृद्धि के अलग मुकाम पर होता.’’
अंगूरी, मनोज, श्यामलाल और लाडबाई जैसे लोगों के जीवन में आया यही बदलाव ‘नया सवेरा’ की सबसे बड़ी खूबसूरती है. ये उस सुबह की कहानियां हैं, जहां पुलिस की वर्दी ने पहली बार किसी बस्ती में डर नहीं, भरोसा पहुंचाया है. इस अभियान ने अपराध को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर नहीं देखा. झालावाड़ पुलिस ने उसके पीछे छिपे गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, सामाजिक उपेक्षा और बेघरपन जैसे कारणों को समझने की कोशिश की.
काबिलेगौर है कि झालावाड़ जिले में कंजर समुदाय के 18 डेरों में करीब 4,100 लोग रहते हैं. इन डेरों से पहले चोरी, लूट, नकबजनी, डकैती, वाहन चोरी और अवैध शराब के प्रतिवर्ष करीब 150 से 200 मामले सामने आते थे. अमित कुमार जब पुलिस अधीक्षक बनकर झालावाड़ आए तो उन्होंने इन डेरों की दशा बदलने की ठानी. उनकी पहल पर पुलिस ने घर-घर सर्वे किया, डेरों के लोगों से संवाद शुरू किया. इस काम में एसआई मदनलाल और हैड कांस्टेबल बाबूलाली स्वामी उनके सारथी बने. नतीजतन, आज करीब 2 हजार लोग अपराध छोड़कर मुख्यधारा से जुड़ने की शपथ ले चुके हैं. अभियान को केवल शपथ तक सीमित नहीं रखा गया. रोजगार के लिए आरटीएम भवानीमंडी के साथ समझौता हुआ, 170 महिला-पुरुषों की भर्ती और प्रशिक्षण प्रक्रिया पूरी की गई और करीब 100 परिवारों को स्थायी रोजगार से जोड़ा गया. बच्चों को फिर से स्कूलों तक पहुंचाने की कोशिश हुई. चालू सत्र में 165 बच्चों का नया नामांकन हुआ, जबकि करीब 900 बच्चे नियमित रूप से पढ़ाई कर रहे हैं.
कंजर समुदाय के 360 लाभार्थियों को आवासीय पट्टे देने की प्रक्रिया अब इस अभियान की एक और बड़ी उपलब्धि बनकर सामने आई है. अपनी जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा इन परिवारों के लिए केवल एक कागज नहीं, बल्कि स्थायी जीवन और सम्मान की नई शुरुआत है.
19 अगस्त को झालावाड़ के पीजी कॉलेज ऑडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में पुनर्वास कार्यक्रम से जुड़े 283 परिवारों को पट्टे वितरित किए गए. इस कार्यक्रम से जुड़े 77 परिवारों को पट्टे जारी करने का काम प्रक्रियाधीन हैं. कोटा रेंज के आईजी हरेंद्र कुमार, झालावाड़ के जिला कलेक्टर अजय सिंह राठौड़, राजस्थान टेक्सटाइल्स मिल भवानीमंडी के अध्यक्ष रोहित अरोड़ा इस कार्यक्रम के प्रतिभागी बने.
पुलिस की इस अनूठी मुहिम का असर अब अपराध के आंकड़ों में भी दिखाई देने लगा है. जहां पहले समुदाय से जुड़े लोगों के खिलाफ हर वर्ष 150 से 200 मामले दर्ज होते थे, वहीं 1 अप्रैल से 15 अगस्त 2026 के बीच केवल 9 मामले दर्ज हुए हैं. अपराध में आई यह गिरावट बेहतर पुलिसिंग का बेजोड़ उदाहरण है. झालावाड़ पुलिस के इस प्रयोग ने यह साबित कर दिया है कि अपराधी को केवल अपराधी की तरह देखकर अपराध खत्म नहीं किया जा सकता बल्कि उसके जीवन में बदलाव लाकर ही इसे थामा जा सकता है.
‘‘कई बार हथकड़ी अपराधी के हाथों को तो बांध सकती है, मगर उसके बच्चों के भविष्य को नहीं बदल सकती. बदलाव तब शुरू होता है, जब किसी के हाथ में हथकड़ी की जगह रोजगार हो, बच्चे के हाथ में हथियार की जगह किताब हो और परिवार के सिर पर अपनी छत का भरोसा हो.’’