
शिक्षा को बचाने की लड़ाई कौन लड़ेगाॽ
प्रश्नपत्र लीक नैतिक संकट है तो करोड़ों रुपये लेकर मेडिकल सीटों की वैध बिक्री सामान्य व्यवस्था क्यों मानी जाती है. आखिर एक अवैध पेपर लीक पर देशव्यापी आक्रोश होता है, जबकि मैनेजमेंट कोटे के नाम पर शिक्षा की खुली खरीद-फरोख्त को व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा क्यों स्वीकार कर लिया गया है.
राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) के प्रश्नपत्र लीक होने के आरोपों के बाद जब हजारों युवा अभ्यर्थी सड़कों पर उतरे तो पूरे देश में आक्रोश की लहर दौड़ गई. उनकी मांगें स्पष्ट थीं कि परीक्षा प्रणाली में सुधार हो, जिम्मेदार एजेंसियों की निष्पक्ष जांच हो, दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई हो और सरकार खुद की व परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी की जवाबदेही तय करे. यह आंदोलन केवल एक परीक्षा का विरोध नहीं था. इसने वर्षों से जमा उस असंतोष को सामने ला दिया जो बेरोज़गारी, प्रशासनिक विफलताओं, संस्थागत क्षरण और भ्रष्टाचार के कारण लगातार बढ़ रहा था. कॉरपोरेट मीडिया जहां इन मुद्दों को अक्सर राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक विमर्श के शोर में दबा देता है, वहीं नीट जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा की साख पर सवाल उठते ही यह असंतोष विस्फोटक रूप में सामने आ गया. लेकिन इन विरोध प्रदर्शनों के पीछे एक असहज सच्चाई भी छिपी है. युवा आंदोलन लगभग पूरी तरह पेपर लीक जैसी अवैध गतिविधियों और सीमित प्रशासनिक जवाबदेही तक सिमट गया, जबकि उस कहीं बड़े और पूरी तरह वैध तंत्र को लगभग अनदेखा कर दिया गया जो प्रतिदिन योग्यता (मेरिट) की अवधारणा को कमजोर करता है. यह तंत्र है उच्च शिक्षा का बढ़ता निजीकरण और व्यावसायीकरण. यही सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न है. यदि प्रश्नपत्र लीक नैतिक संकट है तो करोड़ों रुपये लेकर मेडिकल सीटों की वैध बिक्री सामान्य व्यवस्था क्यों मानी जाती है. आखिर एक अवैध पेपर लीक पर देशव्यापी आक्रोश होता है, जबकि मैनेजमेंट कोटे के नाम पर शिक्षा की खुली खरीद-फरोख्त को व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा क्यों स्वीकार कर लिया गया है.
पेपर लीक नहीं, असली सवाल निजीकरण का :
पेपर लीक और मैनेजमेंट कोटे के बीच का अंतर समकालीन छात्र राजनीति की सबसे बड़ी वैचारिक कमजोरी को उजागर करता है. दोनों व्यवस्थाओं का परिणाम एक ही है. कम अंक प्राप्त करने वाला छात्र आर्थिक क्षमता के आधार पर मेडिकल सीट हासिल कर लेता है, जबकि उससे अधिक अंक लाने वाला छात्र केवल संसाधनों के अभाव में पीछे रह जाता है. पेपर लीक अवैध है, इसलिए उसे अपराध माना जाता है. इसके खिलाफ आंदोलन करना आसान है क्योंकि इस पर लगभग सभी सहमत होते हैं. लेकिन जब कोई निजी मेडिकल कॉलेज मैनेजमेंट कोटे की सीट के लिए प्रतिवर्ष 15 से 30 लाख रुपये तक फीस वसूलता है और पूरी एमबीबीएस डिग्री करोड़ों रुपये की पहुंच में सीमित हो जाती है, तो उसे भ्रष्टाचार नहीं बल्कि "बाज़ार की पसंद" कहा जाता है. 720 में 580 अंक लाने वाला विद्यार्थी यदि करोड़ों रुपये नहीं जुटा सकता तो वह बाहर हो जाता है, जबकि उससे कम अंक प्राप्त करने वाला आर्थिक रूप से सक्षम अभ्यर्थी उसी सीट पर प्रवेश पा लेता है. सवाल यह है कि यदि परिणाम दोनों स्थितियों में एक जैसा है तो एक व्यवस्था अपराध और दूसरी सामान्य बाज़ार कैसे बन गई.
युवा आंदोलन आज अवैध काले बाज़ार यानी पेपर लीक के खिलाफ तो संघर्ष कर रहा है, लेकिन शिक्षा के वैध बाज़ार, कैपिटेशन फीस और मैनेजमेंट कोटे को चुनौती नहीं दे रहा. यानी मांग समान सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की नहीं, बल्कि केवल "निष्पक्ष बाज़ार" की रह गई है.
निजी मेडिकल शिक्षा की कानूनी बुनियाद :
निजी मेडिकल सीटों को मिला कानूनी संरक्षण कोई संयोग नहीं है. इसे न्यायपालिका के कई महत्वपूर्ण निर्णयों ने व्यवस्थित रूप से मजबूत किया है. टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002) के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत मौलिक अधिकार माना. न्यायालय ने शिक्षा के खुले व्यावसायीकरण का विरोध तो किया, लेकिन निजी संस्थानों को "उचित अधिशेष" अर्जित करने और अपनी फीस तय करने की छूट भी दे दी. इसके बाद पी.ए. इनामदार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2005) के फैसले ने मैनेजमेंट और एनआरआई कोटे को कानूनी आधार प्रदान कर दिया. वहीं मॉडर्न डेंटल कॉलेज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2016) में नीट जैसी समान प्रवेश परीक्षा को अनिवार्य तो बनाया गया, लेकिन निजी कॉलेजों की ऊंची फीस व्यवस्था को यथावत रहने दिया. परिणाम यह हुआ कि पात्रता परीक्षा से तय होने लगी, लेकिन प्रवेश की वास्तविक क्षमता बाज़ार ने तय करनी शुरू कर दी.
मध्यवर्ग और टूटता हुआ बाज़ार का सपना :
आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय मध्यवर्ग ने यह विश्वास किया कि निजी शिक्षा, निजी अस्पताल और निजी संस्थान सामाजिक सुरक्षा का विकल्प बन सकते हैं. मेहनत और आर्थिक निवेश के सहारे बेहतर भविष्य हासिल किया जा सकता है. आज वही विश्वास टूटता दिखाई दे रहा है. लाखों रुपये कोचिंग और निजी स्कूलों पर खर्च करने के बावजूद सफलता की कोई गारंटी नहीं है. परीक्षा प्रणाली में अपारदर्शिता, पेपर लीक और संस्थागत कमजोरियों ने इस भरोसे को गहरा आघात पहुंचाया है.
इसके बावजूद मध्यवर्ग एक विरोधाभास में फंसा है. सरकारी मेडिकल सीट छूटने पर निजी कॉलेज की महंगी सीट ही उसे अंतिम विकल्प दिखाई देती है. इसलिए निजी शिक्षा के व्यावसायीकरण का विरोध करते हुए भी वह पूरी तरह उसके खिलाफ खड़ा नहीं हो पाता. बहुत से परिवारों को लगता है कि यदि निजी मैनेजमेंट सीटों पर पूरी तरह रोक लग गई तो उनके बच्चों के लिए आखिरी विकल्प भी समाप्त हो जाएगा. यही कारण है कि वे व्यवस्था से असंतुष्ट होने के बावजूद उसी व्यवस्था पर निर्भर बने रहते हैं.
पेपर लीक का असली स्रोत :
पेपर लीक कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं है. यह अत्यधिक बाज़ारीकृत शिक्षा व्यवस्था का स्वाभाविक परिणाम है. पिछले तीन दशकों में राज्य ने गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक उच्च शिक्षा के विस्तार से दूरी बनाई. इसका परिणाम दो बड़े व्यावसायिक तंत्रों के रूप में सामने आया. पहला, अरबों रुपये का कोचिंग उद्योग. दूसरा, परीक्षा संचालन का बढ़ता निजीकरण.
नीट जैसी उच्च-दांव वाली परीक्षाओं ने कोचिंग उद्योग को विशाल कारोबार में बदल दिया. एक ही परीक्षा छात्र के पूरे भविष्य का फैसला करने लगी. जैसे-जैसे परीक्षा पास करने का आर्थिक मूल्य बढ़ा, वैसे-वैसे प्रश्नपत्र, अंदरूनी जानकारी और संभावित प्रश्नों के समानांतर बाज़ार का मूल्य भी बढ़ता गया. जब सफलता करोड़ों रुपये के करियर से जुड़ जाती है तो पेपर लीक भी लाभ कमाने का कारोबार बन जाता है.
दूसरी ओर राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसियां निजी ठेकेदारों, आउटसोर्स लॉजिस्टिक्स और डिजिटल सेवा प्रदाताओं पर लगातार अधिक निर्भर होती गईं. कम लागत पर काम करने वाले इन निजी सेवा प्रदाताओं के पास विश्वविद्यालयों जैसी संस्थागत सुरक्षा व्यवस्था नहीं होती. परिणामस्वरूप परीक्षा प्रणाली में कई कमजोर कड़ियां पैदा हो जाती हैं, जहां रिश्वतखोरी, सांठगांठ और प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाएं पनपने लगती हैं. इस तरह पेपर लीक किसी शून्य में पैदा नहीं होते. वे उस अनियमित काले बाज़ार का हिस्सा हैं, जिसे शिक्षा के बढ़ते व्यावसायीकरण, अत्यधिक प्रतिस्पर्धा और अवसरों की कमी ने जन्म दिया है.
असली चुनौती अभी बाकी है :
सरकारें बदलती रहेंगी, मंत्री बदलते रहेंगे और जांच समितियां भी बनती रहेंगी. लेकिन जब तक शिक्षा को बाज़ार की वस्तु में बदलने वाली व्यवस्था पर सवाल नहीं उठेंगे, तब तक केवल प्रशासनिक सुधारों से कोई स्थायी परिवर्तन नहीं आएगा. आज आंदोलनकारी युवा किसी मंत्री के इस्तीफे, किसी परीक्षा को रद्द कराने या प्रशासनिक जांच की मांग को अपनी जीत मान लेते हैं. इससे तत्काल राजनीतिक दबाव तो बनता है, लेकिन यदि शिक्षा के निजीकरण और व्यावसायीकरण पर सवाल नहीं उठते तो यह बदलाव केवल सतही साबित होता है. कुछ समय बाद नई परीक्षा होती है, नई एजेंसी काम संभाल लेती है, सुरक्षा व्यवस्था और सख्त कर दी जाती है, लेकिन करोड़ों रुपये लेकर मेडिकल सीट बेचने वाली व्यवस्था जस की तस बनी रहती है.
यदि भारत के युवा वास्तव में शिक्षा में समानता और न्याय चाहते हैं तो उन्हें अपनी लड़ाई का दायरा बढ़ाना होगा. केवल सुरक्षित परीक्षा प्रणाली, कठोर कानून या दोषियों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होगी. असली सवाल यह है कि क्या शिक्षा एक मौलिक अधिकार है या फिर खरीदने-बेचने की वस्तु.
जब तक छात्र आंदोलन प्रश्नपत्र लीक, विद्यार्थियों की बढ़ती चिंता और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी परीक्षा प्रणाली को शिक्षा के बढ़ते निजीकरण और व्यावसायीकरण से जोड़कर नहीं देखेंगे, तब तक व्यवस्था केवल अपनी तकनीकी कमियां सुधारती रहेगी, परीक्षा प्रणाली को और सुरक्षित बनाती रहेगी और दूसरी ओर सबसे अधिक भुगतान करने वालों के लिए मेडिकल सीटों की बिक्री पहले की तरह जारी रहेगी. तब तक योग्यता का यह गुप्त बाज़ार भी पहले की तरह चलता रहेगा.