
नाम में क्या रखा है?
मनरेगा बनाम वीबी जी राम जी
मनरेगा अब 'वीबी-जी रामजी' है और 100 दिन की गारंटी अब 125 दिन की हो गई है. सरकार इसे ग्रामीण भारत की नई विकास यात्रा बता रही है, मगर राजस्थान के पिछले कुछ सालों के आंकड़े और अनुभव इसकी एक अलग ही कहानी बयां करते हैं. जिस राज्य ने देश को पंचायतीराज व्यवस्था, सूचना का अधिकार और रोजगार का अधिकार दिया, वहीं आज मनरेगा में रोजगार, बजट और विकास कार्य लगातार सिमट रहे हैं. मनरेगा अब 'विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन-ग्रामीण (वीबी-जी रामजी) कहलाएगी मगर सवाल अब भी वही है कि क्या 100 दिन रोजगार पाने वाले मजदूरों की संख्या बढ़ेगी, क्या काम के भुगतान की देरी कम होगी और क्या नई व्यवस्था में भ्रष्टाचार व अनियमितताएं खत्म होंगीॽ
करीब बीस वर्षों तक मनरेगा ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा योजना रही है. सूखा पड़ा, आर्थिक मंदी आई, महामारी आई या गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ा, हर संकट में इस कानून ने करोड़ों परिवारों को न्यूनतम रोजगार और आय का सहारा दिया. गांवों में तो आज भी इस बात का उदाहरण दिया जाता है कि मनरेगा के आने से चाहे कुछ ओर बदला हो या न बदला हो मगर मनरेगा में मजदूरी करने वाले लोगों को गांव की किराने की दुकान से उधार मिलने लगा है. यही कारण है कि इसे केवल एक सरकारी योजना नहीं बल्कि ग्रामीण भारत के आर्थिक अधिकार आधारित कानून के रूप में देखा गया. 01 जुलाई को केंद्र सरकार ने इसे नए नाम और नए कलेवर के साथ पूरे देश में लागू कर दिया है. सरकार का तर्क है कि ग्रामीण भारत और ग्रामीण आवश्यकताएं बदल चुकी हैं इसलिए दो दशक पुराने कानून को बदलना समय की जरूरत थी. अब केवल गड्ढे खोदने या अस्थायी कार्य कराने से गांव विकसित नहीं होंगे. इसलिए नई व्यवस्था में रोजगार के साथ स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण, जल संरक्षण, ग्रामीण अधोसंरचना, कृषि आधारित विकास, डिजिटल पारदर्शिता और परिणाम आधारित योजना पर जोर दिया गया है.
पहली नजर में यह बदलाव आकर्षक दिखाई देते हैं. रोजगार की कानूनी गारंटी 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन कर दी गई है. काम करने वालों की अब बायोमेट्रिक उपस्थिति होगी. जीपीएस से हर कार्य की निगरानी होगी. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) संभावित गड़बड़ियों को पहले ही पकड़ लेगा. मजदूरी सीधे बैंक खाते में पहुंचेगी. प्रत्येक ग्राम पंचायत की कार्ययोजना डिजिटल प्लेटफॉर्म पर तैयार होगी. सरकार का दावा है कि इससे भ्रष्टाचार रुकेगा, परिसंपत्तियां टिकाऊ बनेंगी और गांवों की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी. हर बड़ा बदलाव अपने साथ कई नए प्रश्न भी लेकर आता है. वीबी जी राम जी को लेकर भी कुछ ऐसे ही सवाल उठ रहे हैं कि क्या वास्तव में रोजगार बढ़ेगा? क्या गांवों में मजदूरों को पहले से ज्यादा काम मिलेगा? क्या भुगतान समय पर होगा? क्या राज्यों के पास अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाने की क्षमता है? क्या तकनीक उन गांवों तक प्रभावी ढंग से पहुंचेगी जहां आज भी इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता चुनौती बनी हुई है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल क्या नया कानून ग्रामीण भारत के उस भरोसे को बरकरार रख पाएगा जो पिछले दो दशकों में मनरेगा के साथ जुड़ा था?
यही वजह है कि विपक्ष सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहा है. सरकार चाहे इस बदलाव को 'विकसित भारत-2047' की गारंटी की तौर पर प्रचारित कर रही हो मगर विपक्ष की आशंका है कि सरकार ने नाम बदलने के साथ ही चुपके से केंद्र की हिस्सेदारी को भी घटा दिया है जिसका सीधा असर रोजगार पर पड़ेगा. कांग्रेस का आरोप है कि सरकार ने महात्मा गांधी का नाम हटाकर तुकबंदी से राम नाम जोड़कर अपनी सियासी रोटियां सेंकने की कोशिश की है. वाम दल नए कानून को रोजगार की गारंटी से ज्यादा नियंत्रण की व्यवस्था मानते हैं. सामाजिक संगठनों इसके वित्तीय ढांचे को लेकर चिंतित हैं क्योंकि बजट में यदि राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ेगी और केंद्र की जिम्मेदारी सीमित होगी तो भविष्य में रोजगार उपलब्ध कराने में कठिनाई आ सकती है. बहस अब केवल नाम बदलने तक ही सीमित नहीं है बल्कि इस बात पर है कि क्या ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था का चरित्र बदल रहा है?
इस बहस को समझने के लिए राजस्थान से बेहतर उदाहरण शायद कोई दूसरा नहीं हो सकता. देखा जाए तो देश में रोजगार के अधिकार की अवधारणा किसी मंत्रालय या नीति आयोग के दफ्तर में नहीं बनी थी बल्कि इसकी शुरुआत राजस्थान के गांवों से हुई थी. राजसमंद जिले की देवडूंगरी की पहाड़ियों से मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) ने पहली बार यह सवाल उठाया कि अगर लोकतंत्र नागरिक को मतदान का अधिकार देता है तो सम्मानजनक जीवन के लिए रोजगार का अधिकार क्यों नहीं दे सकता? इसी आंदोलन ने आगे चलकर राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून की नींव रखी. वर्ष 2006 में जब यह कानून लागू हुआ तो राजस्थान उसके सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में था. राजस्थान के छह पिछड़े जिलों को शुरुआत में ही इसके दायरे में रखा गया. बाद में यही कानून ग्रामीण भारत की पहचान बन गया.
आज दो दशक बाद जब इस कानून का नाम बदल चुका है तो सबसे बड़ी परीक्षा भी राजस्थान की ही है. क्योंकि सरकार के दावे तभी सार्थक माने जाएंगे जब उस राज्य में बदलाव दिखाई देगा जिसने इस कानून को जन्म दिया था. उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान में योजना की रफ्तार लगातार धीमी हुई है. रोजगार घटा है, बजट कम हुआ है, विकास कार्यों की संख्या घटी है और मजदूरी भुगतान में देरी आज भी बड़ी समस्या बनी हुई है. यही वजह है कि 'वीबी-जी रामजी' की सफलता और असफलता का पहला पैमाना भी राजस्थान ही बनने जा रहा है. ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान में योजना की रफ्तार पिछले पांच वर्षों में लगातार धीमी हुई है. नई व्यवस्था के तहत 125 दिन रोजगार देने का दावा किया जा रहा है मगर राज्य में औसत रोजगार उपलब्धता लगातार नीचे आई है. वर्ष 2022-23 में एक परिवार को औसतन 56.28 दिन रोजगार मिलता था जो 2025-26 में यह घटकर मात्र 44.99 दिन रह गया. चालू वित्तीय वर्ष में तो अब तक हर परिवार को औसतन मात्र 23.27 दिन ही रोजगार मिला है. नए कानून में चाहे रोजगार बढ़ाने की घोषणा हो रही है, मगर राजस्थान में वास्तविक रोजगार आधे से भी कम पर सिमटता दिखाई दे रहा है.
यही स्थिति 100 दिन रोजगार पूरा करने वाले परिवारों की भी है. कुछ साल पहले तक मनरेगा की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना यही माना जाता था कि कितने परिवारों ने पूरे 100 दिन का काम प्राप्त किया. मगर अब तस्वीर तेजी से बदली है. वर्ष 2022-23 में 4.53 लाख परिवारों ने 100 दिन रोजगार पाने का यह लक्ष्य हासिल किया था जो 2023-24 तक पांच लाख परिवारों के आस-पास तक पहुंच चुका था मगर 2025-26 में 100 दिन रोजगार पाने वाले लोगों की यह संख्या अचानक घटकर 2.29 लाख रह गई. चालू वर्ष में अब तक केवल 26 हजार परिवार ही इस स्तर तक पहुंच पाए हैं. यह गिरावट केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह बताती है कि कानून की गारंटी और जमीन पर उपलब्ध रोजगार के बीच की दूरी लगातार बढ़ रही है.
रोजगार में आई इस गिरावट का सीधा संबंध बजट से भी दिखाई देता है. राज्य को मिलने वाला श्रम बजट लगातार कम हुआ है. वर्ष 2021-22 में जहां लेबर बजट 3735 करोड़ रुपए था, वह 2025-26 में घटकर 2000 करोड़ रुपए रह गया. केंद्र से मिलने वाली राशि में भी लगातार कमी आई है. वर्ष 2022-23 में राजस्थान को केंद्र से करीब 9702 करोड़ रुपए मिले थे जो 2024-25 में घटकर लगभग 7703 करोड़ रुपए रह गया है. 2025-26 में यह राशि लगभग 5370 करोड़ रुपए तक सिमट गई है. चालू वर्ष के शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि अब तक राजस्थान को केवल 1591 करोड़ रुपए ही जारी हुए हैं. बजट की यदि यही रफ्तार बनी रही तो रोजगार के अवसरों पर इसका सीधा असर पड़ना तय माना जा रहा है. नई व्यवस्था में राज्यों की वित्तीय हिस्सेदारी बढ़ाने का निर्णय भी राजस्थान जैसे बड़े राज्यों के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बन सकता है. पहले अकुशल मजदूरी का अधिकांश भार केंद्र सरकार वहन करती थी. अब सामान्य राज्यों के लिए 60:40 की हिस्सेदारी का मॉडल लागू किया जा रहा है. सरकार का तर्क है कि इससे राज्यों की जवाबदेही बढ़ेगी और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप योजनाएं बनेंगी मगर अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि यदि राज्यों की वित्तीय स्थिति कमजोर हुई तो सबसे पहले रोजगार के अवसर प्रभावित होंगे.
राजस्थान के आंकड़े यह भी बताते हैं कि योजना के तहत बनने वाली परिसंपत्तियों की गति लगातार धीमी हुई है. वर्ष 2022-23 में जहां लगभग 88 लाख व्यक्तिगत कार्य स्वीकृत हुए थे वहीं 2025-26 तक यह संख्या करीब 60 लाख रह गई और चालू वर्ष में लगभग 27.5 लाख कार्य ही दर्ज हुए हैं. पूर्ण कार्यों की संख्या में भी गिरावट दिखाई देती है. इसका मतलब है कि गांवों में बनने वाले तालाब, एनीकट, चारागाह, खेत-तलाई, मेड़बंदी, ग्रामीण सड़कें और जल संरक्षण जैसे स्थायी विकास कार्य भी पहले की तुलना में कम हुए हैं.
राजस्थान में मनरेगा के तहत कृषि आधारित कार्यों पर खर्च का प्रतिशत भी लगातार नीचे आया है. वर्ष 2024-25 में कुल व्यय का 46.43 प्रतिशत कृषि और उससे जुड़े कार्यों पर खर्च हुआ था जो अब घटकर लगभग 33 प्रतिशत रह गया है. नई योजना का सबसे बड़ा दावा ही कृषि, जल संरक्षण और उत्पादक परिसंपत्तियों को मजबूत करना है. ऐसे में यह गिरावट नीति और क्रियान्वयन के बीच के अंतर की ओर संकेत करती है.
सरकार का तर्क है कि नई व्यवस्था में तकनीक इस अंतर को कम करेगी. प्रत्येक श्रमिक की बायोमेट्रिक उपस्थिति होगी, कार्यस्थलों की निगरानी जीपीएस से होगी, मोबाइल एप के जरिए वास्तविक समय में प्रगति दर्ज होगी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संदिग्ध भुगतान, फर्जी मस्टर रोल और कागजी कार्यों की पहचान करेगा, ग्राम पंचायतों को नियमित सामाजिक अंकेक्षण करना होगा और पूरा डेटा सार्वजनिक डैशबोर्ड पर उपलब्ध रहेगा
राजस्थान में मजदूरों की सबसे बड़ी चिंता आज भी तकनीक नहीं, बल्कि मजदूरी का समय पर भुगतान है. कानून कहता है कि 15 दिन के भीतर मजदूरी मिलनी चाहिए मगर वास्तविकता यह है कि हजारों मामलों में भुगतान 90 दिन से अधिक समय से लंबित है. 16 से 30 दिन की देरी वाले मामलों की संख्या भी बड़ी है. देरी पर क्षतिपूर्ति का कानूनी प्रावधान होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई लगभग न के बराबर होती है मजदूरों के लिए सबसे बड़ा सवाल आज भी यही है कि काम मिलने के बाद मेहनताना आखिर कब मिलेगाॽ
किसी भी योजना की सफलता उसके नए नाम, नए लोगो या नई तकनीक से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि गरीब परिवारों तक वास्तव में कितना रोजगार पहुंचता है. इस योजना ने गांवों की अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह बढ़ाया, पलायन कम किया और कृषि आधारित परिसंपत्तियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
मनरेगा की सबसे बड़ी ताकत उसका अधिकार आधारित स्वरूप था. मनरेगा केवल मजदूरी देने वाली योजना नहीं थी, बल्कि गांवों की सामाजिक सुरक्षा का सबसे मजबूत आधार थी. सूखे के वर्षों में, आर्थिक संकट के समय और कोविड महामारी के दौरान इसी योजना ने लाखों परिवारों को गांव छोड़ने से रोका. यदि बजट और रोजगार दोनों लगातार घटते रहे तो नया कानून अपने घोषित उद्देश्य हासिल नहीं कर पाएगा.
| वर्ष | औसत रोजगार |
|---|---|
| 2022-23 | 56.28 |
| 2023-24 | 58.75 |
| 2024-25 | 53.79 |
| 2025-26 | 44.99 |
| 2026-27 | 23.27 |