
संस्कृति के सुरों में हमेशा जिंदा रहेंगे मालू
कुछ लोग अपनी ज़िंदगी जीते हैं, कुछ लोग अपने दौर को बदलते हैं और कुछ लोग अपनी मिट्टी की रूह बन जाते हैं. केशरीचंद 'के.सी.' मालू ऐसी ही शख़्सियत थे.
13 जुलाई 2026 को केशरीचंद (के.सी.) मालू इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह गए मगर सच तो यह है कि कुछ लोग सिर्फ जिस्म से रुख़्सत होते हैं, अपनी पहचान से नहीं. राजस्थान की लोक संस्कृति, लोक संगीत और मायड़ भाषा के अग्रदूत केसी मालू ने अपनी पूरी जिंदगी इस मिट्टी की रूह को आवाज देने में गुजार दी. वो हमेशा अपने सुरों, अपने ख्वाबों और अपनी सांस्कृतिक विरासत के ज़रिए हम सबसे बीच जिंदा रहेंगे. केसी मालू एक ऐसी शख्सियत रहे हैं जिन्होंने लगभग पांच दशक तक अपनी ज़िंदगी का हर लम्हा लोकगीतों, लोक धुनों और मायड़ भाषा की ख़िदमत में समर्पित कर दिया. यदि आज दुनिया के किसी भी कोने में बैठा कोई प्रवासी राजस्थानी अपनी मिट्टी की महक महसूस कर पाता है तो उसमें कहीं न कहीं के.सी. मालू की उम्रभर की मेहनत और मोहब्बत शामिल है. आज वे चाहे हमारे बीच नहीं हैं मगर उनका काम, उनका विजन और उनकी छोड़ी हुई सांस्कृतिक विरासत हमेशा हम सबके बीच मौजूद रहेगी. जब-जब किसी आंगन में बन्ना-बन्नी गूंजेगी, जब-जब घूमर की थाप पर पांव थिरकेंगे, जब-जब कोई प्रवासी राजस्थानी 'धरती धोरां री...' सुनकर अपनी मिट्टी को याद करेगा, तब-तब के.सी. मालू की मौजूदगी भी उन सुरों में महसूस होगी.
मालू ने कभी शोहरत के लिए अपनी संस्कृति का सौदा नहीं किया. जब बाजार में लोक संगीत की जगह शोर और सस्ती लोकप्रियता हावी होने लगी, तब भी के.सी. मालू अपनी रवायतों, अपने उसूलों और अपनी सांस्कृतिक जिम्मेदारी पर अडिग रहे. उनके लिए लोकगीत महज मनोरंजन नहीं थे, बल्कि समाज की तहजीब, उसकी यादों और उसकी पहचान का आईना थे. जब संगीत का बाजार अश्लीलता और फूहड़ गानों के बिकाऊ मनोरंजन की ओर बढ़ रहा था, तब वे लोक संगीत की आत्मा को बचाने में जुटे थे. उनके लिए गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की स्मृति थे. यही कारण है कि 'वीणा' के गीत आज भी समय की कसौटी पर उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने अपने दौर में थे.
राजस्थान की लोक संस्कृति के इस पुरोधा का जन्म 4 जुलाई 1946 को चूरू जिले के सुजानगढ़ कस्बे के एक जैन परिवार में हुआ था. बहुत कम लोगों को मालूम है कि उन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत जयपुर में प्रिंटिंग व्यवसाय से की थी, मगर उनका मन हमेशा कला, साहित्य और संगीत की दुनिया में रमा रहा. उन्होंने जल्दी ही समझ लिया था कि यदि लोक संस्कृति और लोक संगीत को व्यवस्थित ढंग से सहेजा नहीं गया तो जल्द ही हमारी अमूल्य सांस्कृतिक विरासत विलुप्त हो जाएगी. यही चिंता आगे चलकर उनके जीवन का सबसे बड़ा संकल्प बन गई. वर्ष 1977 में उन्होंने 'सुर संगम संस्थान' की स्थापना की. यह केवल एक सांस्कृतिक संस्था नहीं थी, बल्कि हजारों युवा गायकों और संगीत प्रतिभाओं को मंच देने वाला एक सशक्त आंदोलन था. गत 49 वर्षों से सुर संगम संस्थान ने देश के 125 केंद्रों के माध्यम से लगभग दो लाख 50 हजार गायक-गायिकाओं को अपनी आवाज की खनक और हुनर प्रस्तुत करने का अवसर दिया. इस मंच से शुरुआत करने वाले हजारों कलाकार आज अगर संगीत के दुनिया के फलक पर अपनी चमक बिखेर रहे हैं तो इसके पीछे केसी मालू का ही योगदान है.
सुर संगम के बाद केसी मालू ने साल 1987 में वीणा कैसेट्स के रूप में एक ऐसा ऐतिहासिक अध्याय लिखा जिसने राजस्थानी गीत-संगीत को अमर बना दिया. राजस्थानी संगीत उद्योग में मालू को आज भी 'वीणा कैसेट्स के जनक' के रूप में भी याद किया जाता है. जब राजस्थानी लोकगीत बिखरे पड़े थे और उन्हें व्यवस्थित रूप से रिकॉर्ड करने का कोई बड़ा प्रयास नहीं हुआ था, तब के.सी. मालू ने सीमित संसाधनों में लोकगीतों का अभूतपूर्व संग्रह तैयार किया. पांच सौ से अधिक एलबम, पांच हजार से ज्यादा लोकगीत और विवाह संस्कारों से जुड़े 221 लोकगीतों का दस्तावेजीकरण केवल एक व्यावसायिक उपलब्धि नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का ऐतिहासिक कार्य था. उन्होंने महज एक साल में वीणा कैसेट्स को किन ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 3 मई 1988 को वीणा कैसेट्स के एलबम ‘चूंदड़ी’ का विमोचन तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हाथों हुआ. इसके बाद 15 मई 2000 को राजस्थानी संगीत का वह सुनहरा दौर आया जब वीणा कैसेट्स के सुर देश की सीमाओं से निकलकर परदेश की धरती तक पहुंचे. चार भागों में जारी इस एलबम की लोकप्रियता की इससे बड़ी मिशाल क्या होगी कि ‘घूमर’ को दुनिया के टॉप 10 नृत्यों में चौथा स्थान हासिल हुआ.

तकनीक आई तब भी उन्होंने बिना विचलित हुए उसे अपने काम का सहयोगी बनाया. वेबसाइट, यूट्यूब, मोबाइल एप और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से उन्होंने राजस्थानी संगीत को दुनिया के हर कोने तक पहुंचाया. हजारों प्रवासी राजस्थानी परिवारों के लिए 'वीणा' अपनी मिट्टी से जुड़े रहने का सबसे भरोसेमंद माध्यम बन गई. के.सी. मालू केवल संगीतकार व निर्माता ही नहीं बल्कि उत्कृष्ट कोटि के लेखक, संपादक, आयोजक और सांस्कृतिक आंदोलन के अग्रदूत भी थे. कन्हैया लाल सेठिया के 'धरती धोरां री...' जैसे कालजयी गीत को जन-जन तक पहुंचाने में उनकी ही अहम भूमिका रही. साहित्यिक नाम 'कांत' से लिखा गया उनका राजस्थान का जयगान ‘कोटि-कोटि कंठा सू गावां म्हैं इण रो जयगान, म्हारो प्यारो राजस्थान, जय-जय राजस्थान’ आज भी प्रदेश की अस्मिता का स्वर है. 'गोरबंद' धारावाहिक और 'स्वर सरिता' पत्रिका उनके इसी सांस्कृतिक दृष्टिकोण का विस्तार थे.
मायड़ भाषा उनके लिए केवल बोली नहीं, बल्कि पहचान थी. राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के अभियान में उन्होंने वर्षों तक सक्रिय भूमिका निभाई. उनका विश्वास था कि जिस समाज की भाषा कमजोर पड़ जाती है, उसकी सांस्कृतिक स्मृति भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है. इसलिए उन्होंने भाषा और संस्कृति—दोनों को साथ लेकर चलने का संकल्प निभाया. राजस्थान सरकार ने वर्ष 2022 में उन्हें प्रदेश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'राजस्थान रत्न' से सम्मानित किया. वे अक्सर कहा करते थे - "यदि संस्कृति को बचाना है तो परंपराओं को जानना होगा, और लोक संगीत उसका सबसे सशक्त माध्यम है." शायद यही एक वाक्य उनके पूरे जीवन का सबसे सटीक परिचय है.
कुछ लोग अपनी ज़िंदगी जीते हैं, कुछ लोग अपने दौर को बदलते हैं और कुछ लोग अपनी मिट्टी की रूह बन जाते हैं. केशरीचंद 'के.सी.' मालू ऐसी ही शख़्सियत थे. लोग इमारतें बनाते हैं, उन्होंने संस्थाएं बनाईं. लोग शोहरत कमाते हैं, उन्होंने पीढ़ियां तैयार कीं. लोग गीत गाते हैं, उन्होंने हजारों गीतों को समय की धूल में खोने से बचा लिया. यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है. यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है. शायद इसलिए के.सी. मालू को याद करने का सबसे अच्छा तरीका उनके अधूरे सपनों को आगे बढ़ाना है. यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.
'पंचायत स्वर' परिवार इस महान सांस्कृतिक पुरोधा को कृतज्ञ नमन पेश करता है. मायड़ भाषा, लोक संगीत और राजस्थान की सांस्कृतिक अस्मिता के इस अनथक प्रहरी को विनम्र श्रद्धांजलि.