राजस्थान के विश्वविद्यालयों में मराठी भाषा पढ़ाने को लेकर राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े के निर्देशों ने प्रदेश में नई बहस और नए सवाल छोड़ दिए. जिस प्रदेश की अपनी मायड़ भाषा राजस्थानी आज भी संवैधानिक मान्यता की प्रतीक्षा में है वहां अन्य भाषा को बढ़ावा देने का राजभवन माफ कीजिए लोकभवन का यह फरमान जले पर नमक छिड़कने जैसा लग रहा है. राज्यपाल के इस बयान पर विवाद बढ़ा तो उन्होंने सूबे के 11 विवि. में राजस्थानी भाषा अध्ययन केंद्र खोले जाने के आदेश जारी कर दिए.
Dr Mukesh Balwada
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राजस्थान के विश्वविद्यालयों में मराठी भाषा पढ़ाने को लेकर राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े के निर्देशों ने प्रदेश में नई बहस और नए सवाल छोड़ दिए हैं. जिस प्रदेश की अपनी मायड़ भाषा राजस्थानी आज भी संवैधानिक मान्यता की प्रतीक्षा में है वहां अन्य भाषा को बढ़ावा देने का राजभवन माफ कीजिए लोकभवन का यह फरमान जले पर नमक छिड़कने जैसा लग रहा है. राजस्थानी बनाम मराठी का यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब 82 वर्षों से अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रही राजस्थानी भाषा को देश की सुप्रीम अदालत ने 12 मई 2026 को बड़ा कानूनी संबल दिया था. अदालत ने राजस्थान सरकार को सरकारी और निजी स्कूलों में राजस्थानी पढ़ाने की नीति बनाने का आदेश देते हुए यह स्पष्ट किया कि मातृभाषा का अधिकार संविधान और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की मूल भावना का हिस्सा है. इस फैसले के बाद पूरे प्रदेश में राजस्थानी को लेकर एक नई उम्मीद और भरोस जगा था मगर उसी वक्त मराठी का यह सवाल राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श के केंद्र में आ खड़ा हुआ है. 82 साल का लंबा इंतज़ार… मायड़ (मातृ) भाषा की वह पुकार, जो कभी लोकगीतों में गूंजी, कभी संसद के गलियारों में सुनाई दी, कभी जंतर-मंतर के धरनों में फूटी और कभी गांव की चौपालों पर बहस बनी. राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की लड़ाई पीढ़ियों से चलती रही, मगर हर बार जयपुर व दिल्ली की चौखट पर आकर ठहर गई. 12 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले के जरिए इस संघर्ष को एक नई सांस तो दी, मगर सियासत फिर अपनी चाल चल गई. सुप्रीम अदालत ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिए हैं कि राज्य के सभी सरकारी और निजी स्कूलों में राजस्थानी भाषा को पढ़ाने के लिए नीति बनाए. यह फैसला केवल एक भाषा का नहीं, बल्कि उस अस्मिता का सम्मान है, जिसे राजस्थानी समाज पिछले आठ दशकों से बचाए रखने की लड़ाई लड़ रहा है. इस ऐतिहासिक फैसले ने अब इस लड़ाई को एक नया मोड़ दिया है. राजस्थानी भाषा के लिए लंबे समय से लड़ाई लड़ रहे वरिष्ठ पत्रकार पदम मेहता और शिक्षाविद् कल्याण सिंह शेखावत की याचिका पर जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा देना राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की मूल भावना है. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक मान्यता का इंतजार करते हुए किसी भाषा को शिक्षा से बाहर रखना तर्कसंगत नहीं है. अदालत ने राजस्थान सरकार से पूछा कि जब विश्वविद्यालयों में राजस्थानी पढ़ाई जा रही है तो स्कूलों में इसे लागू करने में देरी क्यों?
राजस्थानी भाषा की यह यात्रा केवल शब्दों की यात्रा नहीं रही, बल्कि पहचान, स्वाभिमान और सांस्कृतिक अस्तित्व की लड़ाई रही है. नेपाल में बाबूराम भट्टाराई सरकार मंत्री रहे हेमराज तातेड़ जब 2011 में जोधपुरी साफा पहनकर राजस्थानी में शपथ लेते हैं तब यह भाषा सीमाओं से परे अपनी जीवंतता साबित करती है मगर विडंबना देखिए कि जिस भाषा में नेपाल का मंत्री शपथ ले सकता है उसी भाषा में राजस्थान विधानसभा का विधायक शपथ नहीं ले सकता. राजस्थान की मौजूदा 16वीं विधानसभा में शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी और कोलायत विधायक अंशुमान सिंह भाटी समेत 24 विधायकों ने राजस्थानी में शपथ लेने की इच्छा जताई थी. उन्होंने मायड़ भाषा में शपथ-पत्र पढ़ा भी, मगर संवैधानिक मान्यता के अभाव में उसे सदन की कार्यवाही का हिस्सा नहीं बनाया गया. विधानसभा और लोकसभा जैसे सदनों में भी कई बार राजस्थानी भाषा के लिए आवाज उठी, मगर संविधान में अभी तक उसे भाषा का दर्जा हासिल नहीं हुआ. काबिलेगौर है कि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं को ही संसद और विधानसभा में शपथ से लेकर संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं तक विशेष अधिकार प्राप्त हैं.
1950 में 14 भाषाओं से शुरू हुई यह सूची आज 22 भाषाओं तक पहुंच चुकी है, मगर राजस्थानी को अब भी मान्यता का इंतजार है. केंद्र सरकार खुद संसद में स्वीकार कर चुकी है कि राजस्थानी समेत 38 भाषाएं मान्यता की प्रतीक्षा में हैं, मगर इसके लिए कोई तय मापदंड नहीं है. कोर्ट का यह रुख इसलिए भी अहम है क्योंकि अब तक सरकारें राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं होने का हवाला देकर स्कूली शिक्षा में इसे लागू करने से बचती रही थीं. सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि भाषा केवल संवैधानिक सूची का विषय नहीं, बल्कि बच्चों के सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकारों का प्रश्न भी है.
राजस्थानी भाषा को लेकर कुछ लोग यह सवाल उठाते रहे हैं कि आखिर ‘कौनसी राजस्थानी’ को मान्यता मिले. राजस्थान में यह कहावत भी प्रचलित है – ‘‘हर कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी’’ यानी, एक कोस (3.12 किमी.) पर पानी बदल जाता है और 4 कोस (12.48 किमी.) पर बोली बदल जाती है. मारवाड़ी, मेवाड़ी, हाड़ौती, ढूंढ़ाड़ी, शेखावाटी, बागड़ी, मेवाती, वागड़ी, अहिरवाटी, मालवी और निमाड़ी जैसी अनेक बोलियां यहां जीवित हैं जिनका हवाला देकर हुक्मरान इसे मान्यता देने से बचते रहे हैं मगर राजस्थानी साहित्यकार इन विविध बोलियों को कमजोरी नहीं, बल्कि भाषा की सबसे बड़ी ताकत मानते हैं.
‘‘एक ही राज्य के अलग-अलग हिस्सों में एक ही शब्द का अलग-अलग उच्चारण हो सकता है. जिन राज्यों की भाषाओं को संवैधानिक मान्यता है वहां भी कुछ शब्द अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरह से बोले जाते हैं. इसलिए कौनसी राजस्थानी जैसे सवाल उठाना बेमानी है.’’
राजबीर सिंह चनकोई, शिक्षाविद्
‘‘बोलियों की विविधता किसी भाषा की खूबसूरती होती है, अवरोध नहीं. संस्कृत के अलावा कोई भी भाषा ऐसी नहीं है जिसमें बोलियों की विविधता न हो. दुनिया की कोई भी भाषा बिना बोलियों के नहीं हो सकती. भाषा के पर्याववाची शब्द तभी होंगे जब उसकी बोलियां होंगी.’’
भरत ओलाा, साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता राजस्थानी लेखक
राजस्थान भाषा की मान्यता में स्वतंत्र लिपि नहीं होने को भी एक अड़चन के तौर पर देखा जाता है, लेकिन राजस्थानी के साहित्यकार इससे इत्तेफाक नहीं रखते. डॉ. राजपुरोहित कहते हैं – ‘‘जब संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 में से 8 भाषाओं की लिपि देवनागरी हो सकती है तो राजस्थानी की क्यों नहीं? संस्कृत भाषा की देवनागरी लिपि को जब हिंदी व अन्य भाषाएं अपना सकती है तो राजस्थानी के लिए ही अड़चन क्यों? देवनागरी लिपि में राजस्थानी भाषा का जितना विपुल साहित्य मौजूद है शायद ही उतना देश की किसी अन्य भाषा को हो.’’
देखा जाए तो तकनीकी और व्याकरण के तौर पर भी राजस्थानी भाषा बहुत समृद्ध है. पदमश्री सीताराम लालस, गियर्सन, टैस्सीटोरी, आचार्य हेमचंद्र, नरोत्तमदास स्वामी और सुनीत कुमार चटर्जी ने राजस्थानी भाषा की व्याकरण और शब्दकोश लिखे हैं. इसके अलावा बद्री प्रसाद साकरिया व बीएल माली के शब्दकोश भी प्रकाशित हैं. राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड और कई विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा पढाई जाती है. आकाशवाणी जयपुर से रोज राजस्थानी में समाचार और कार्यक्रम प्रसारित होते हैं और पिछले 40 साल से राजस्थानी भाषा में फिल्मों का निर्माण हो रहा है. साहित्य अकादमी दिल्ली भी 52 साल पहले राजस्थानी को भाषा का दर्जा दे चुकी है. साहित्य अकादमी देश की जिन 24 भाषाओं के लिए पुरस्कार प्रदान करती है उनमें संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं के अलावा राजस्थानी भी शामिल है. राजस्थानी के ख्यातनाम साहित्यकार विजयदान देथा की लोक कथाओं पर आधारित पुस्तक ‘बातां री फुलवाड़ी’ को पहला 1974 में पहला अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया. 1974 से अब तक हर साल राजस्थानी भाषा में प्रकाशित किताबों को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलता रहा है.
‘‘इस फैसले का असर केवल भाषा तक सीमित नहीं रहेगा. अगर राजस्थानी स्कूलों में विषय के रूप में लागू होती है तो शिक्षकों की भर्ती होगी, रीट जैसी परीक्षाओं में इसे शामिल किया जा सकेगा और युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर खुलेंगे. सबसे बड़ी बात यह कि नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा में अपने इतिहास, लोककथाएं और साहित्य पढ़ सकेगी.
पदम मेहता, राजस्थानी भाषा के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता
कुल मिलाकर राजस्थानी समाज के लिए यह फैसला किसी कानूनी आदेश से ज्यादा भावनात्मक महत्व रखता है. यह उस भाषा की वापसी है, जिसे लोग मायड़ भाषा कहकर सम्मान देते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भले अभी आठवीं अनुसूची का दरवाजा न खोला हो, लेकिन उसने उस दरवाजे तक जाने वाला रास्ता जरूर रोशन कर दिया है.