
जहां एक भी जैन परिवार नहीं, वहां 400 साल से गूंज रहे आदिनाथ के जयकारे
उदयपुर के चांसदा में आस्था और सामाजिक सद्भाव की अनूठी मिसाल, दशलक्षण पर्व के समापन पर निकली भव्य रथयात्रा में उमड़े हजारों श्रद्धालु, नए साल पर मंदिर में हुई चमत्कारिक घटनाओं से बढ़ी लोगों की श्रद्धा
राजस्थान के गांवों की पहचान केवल उनकी भौगोलिक स्थिति, खेती-किसानी और ग्रामीण जीवन से नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही उन परंपराओं से भी बनती है. उदयपुर से 40 किलोमीटर दूर चांसदा गांव ऐसी ही एक अनूठी मिसाल पेश करता है. यहां जैन समाज का एक भी परिवार नहीं रहता, मगर करीब 400 साल पुरानी भगवान आदिनाथ की प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध दिगंबर जैन मंदिर में श्रद्धा का ऐसा माहौल है कि हर साल दशलक्षण पर्व के समापन पर भव्य रथयात्रा निकाली जाती है. रावत और अन्य समुदायों की आबादी वाले इस गांव में भगवान आदिनाथ के जयकारे और धार्मिक परंपराएं सामाजिक सद्भाव की मिसाल पेश करते हैं.
गत 11 अक्टूबर को दशलक्षण पर्व के समापन पर भी गांव में भक्ति और उल्लास का माहौल रहा. बैंड-बाजों, ढोल-नगाड़ों और धार्मिक जयकारों के बीच भगवान आदिनाथ की भव्य रथयात्रा निकाली गई. रथयात्रा में हजारों श्रद्धालु शामिल हुए. भक्ति गीतों और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच निकली यात्रा ने एक बार फिर चांसदा की उस परंपरा को जीवंत कर दिया, जिसमें आस्था किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है. जैन धर्म में दशलक्षण पर्व का विशेष महत्व है. इसके समापन पर निकाली जाने वाली रथयात्रा श्रद्धा, भक्ति और धार्मिक उल्लास का प्रतीक होती है. चांसदा में यह आयोजन हर साल परंपरागत उत्साह के साथ होता है.

चांसदा के दिगंबर जैन मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता कमल पुष्प पर विराजित भगवान आदिनाथ की प्राचीन प्रतिमा है. जैन मंदिर से संबंधित विवरण में प्रतिमा को करीब 400 वर्ष पुराना बताया गया है. मंदिर के व्यवस्थापक अनिल कुमार के अनुसार - 2009 में प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ इसे मंदिर में विराजमान किया गया. इसके बाद वर्ष 2019 में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया.
चांसदा मंदिर को लेकर नए साल के पहले दिन हुई बताई गई दो घटनाओं की चर्चा भी श्रद्धालुओं के बीच होती है. मंदिर प्रबंधन से मिली जानकारी के अनुसार - 1 जनवरी 2025 को मंदिर में करीब तीन घंटे तक पानी स्वतः बहने की घटना हुई थी. वहीं 1 जनवरी 2026 को भगवान आदिनाथ की प्रतिमा का रंग काले से ग्रेफाइट होने की घटना सामने आई. इन घटनाओं को श्रद्धालु विशेष महत्व देते हैं और इनके कारण मंदिर के प्रति लोगों की श्रद्धा ओर बढ़ने लगी है.
चांसदा की धार्मिक विरासत से जुड़ी एक अन्य महत्वपूर्ण पहल साधु-संतों के ठहरने और उनके आहार-विहार की व्यवस्था है. जैन मुनि आचार्य सुनील सागर के संज्ञान में मंदिर और प्राचीन प्रतिमा की जानकारी आने के बाद साधु-संतों की सुविधाओं के लिए व्यवस्था विकसित करने की पहल हुई. इसी क्रम में 'सन्मति-अभिनंदन संत भवन' नाम को स्वीकृति मिली. यह पहल मंदिर को केवल दर्शन का स्थान नहीं, बल्कि साधु-संतों की सेवा और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण से जोड़ने का प्रयास भी है. मंदिर में आदिनाथ के दर्शन के लिए मुनि विज्ञानमति माता, अपूर्व सागर महाराज सहित कई जैन साधु-संत आ चुके हैं.
चांसदा की कहानी केवल एक प्राचीन मंदिर या वार्षिक रथयात्रा की कहानी नहीं है. इसकी खासियत यह है कि यहां जैन समाज का कोई परिवार नहीं होने के बावजूद भगवान आदिनाथ का मंदिर अपनी धार्मिक पहचान बनाए हुए है. गांव के लोग और श्रद्धालु इस विरासत से जुड़े हुए हैं. दशलक्षण पर्व पर निकलने वाली रथयात्रा इसी आस्था और सामाजिक सहभागिता का प्रतीक है. करीब चार सदियों पुरानी बताई जाने वाली प्रतिमा, मंदिर का जीर्णोद्धार, साधु-संतों की सेवा के लिए संत भवन की पहल और हर साल होने वाला धार्मिक आयोजन चांसदा को विशिष्ट बनाते हैं. यह गांव याद दिलाता है कि परंपराएं केवल किसी एक समुदाय की धरोहर नहीं होतीं, बल्कि समाज की सामूहिक भागीदारी से ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती हैं.
