
राजस्थान के दो ‘धुरंधर’ तय करेंगे पंजाब का सियासी भविष्य
पंजाब के चुनावी रण में आमने-सामने होंगे राजस्थान के दो रणनीतिकार
राजस्थान की राजनीति के दो अनुभवी चेहरे अब पंजाब के चुनावी रण में अपनी रणनीतिक क्षमता का इम्तिहान देते नजर आएंगे. कांग्रेस ने सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाया है जबकि भाजपा पहले ही राजस्थान के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष और राज्यसभा सांसद सतीश पूनियां को पंजाब की कमान सौंप चुकी है.
यानी, 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव में इस बार एक दिलचस्प राजनीतिक मुकाबला दिखाई देगा. एक तरफ सतीश पूनियां भाजपा की रणनीति संभालेंगे वहीं सचिन पायलट कांग्रेस की चुनावी बिसात बिछाते नजर आएंगे. पंजाब की यह सियासी जंग इसलिए भी खास है क्योंकि राजस्थान के ये दोनों नेता अपनी-अपनी पार्टियों के प्रदेशाध्यक्ष रह चुके हैं और पिछले चुनावों में राज्य प्रभारी रहते हुए दोनों ने अपनी पार्टियों को जीत दिलाई है.
सतीश पूनियां के प्रभारी रहते हुए 2024 में भाजपा ने हरियाणा में 57 साल का रिकॉर्ड धराशाही करते हुए तीसरी बार सत्ता में वापसी की. हरियाणा की यह जीत इसलिए भी खास थी क्योंकि चुनाव पूर्व सारे अनुमान यहां भाजपा की हार बता रहे थे. हरियाणा में भाजपा की चुनावी सफलता के बाद पूनियां की रणनीतिक क्षमता पर पार्टी नेतृत्व का भरोसा बढ़ा है. उन्हें पंजाब का प्रभारी बनाना भी इसी भरोसे का संकेत माना जा रहा है.
सियासी जानकारों की मानें तो पंजाब की स्थिति हरियाणा से काफी अलग है. पंजाब में भाजपा कभी अकेले दम पर सरकार नहीं बना पाई. भाजपा आखिरी बार पंजाब में 2007 से 2017 तक शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन सरकार का हिस्सा रही. ऐसे में यदि 2027 में भाजपा सत्ता में लौटती है तो करीब एक दशक बाद उसकी पंजाब की सत्ता में वापसी होगी. इस बार यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि सतीश पूनियां साफ कह चुके हैं कि भाजपा पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ेगी और किसी गठबंधन पर निर्भर नहीं रहेगी.
देखा जाए तो पंजाब में भाजपा की राजनीति लंबे समय तक अकाली दल के साथ गठबंधन के सहारे आगे बढ़ी है. दोनों दलों ने 1997, 2007 और 2012 में साथ मिलकर सरकार बनाई मगर इस बार भाजपा का लक्ष्य सिर्फ सत्ता में साझेदारी नहीं बल्कि पंजाब में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत साबित करना है. ऐसे में पूनियां के सामने पंजाब में बूथ स्तर पर संगठन मजबूत करने, ग्रामीण इलाकों में पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ाने और भाजपा को एक स्वतंत्र विकल्प के रूप में स्थापित करने की चुनौती होगी.
यदि भाजपा पंजाब में अपने दम पर या किसी भी राजनीतिक समीकरण के जरिए सत्ता तक पहुंचती है तो इसके परिणाम सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं रहेंगे बल्कि इसका सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह होगा कि भाजपा ने उत्तर भारत के उस महत्वपूर्ण राज्य में अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन मजबूत कर ली है जहां लंबे समय तक उसकी भूमिका मुख्यतः गठबंधन सहयोगी की रही है. पंजाब में सत्ता मिलना पार्टी के लिए यह संदेश होगा कि वह क्षेत्रीय दलों और मजबूत स्थानीय राजनीतिक परंपराओं वाले राज्यों में भी अपने दम पर सत्ता का विकल्प बन सकती है. पंजाब की जीत का असर पड़ौसी हरियाणा, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर की राजनीति पर भी पड़ सकता है.
भाजपा पंजाब में अकेले दम पर सरकार बनाने में सफल हुई तो सतीश पूनियां का राष्ट्रीय राजनीतिक कद भी कई गुना बढ़ जाएगा. पंजाब जैसे कठिन राज्य में भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने वाले रणनीतिकार के रूप में उनका नाम पार्टी के बड़े चुनावी प्रबंधकों की सूची में शामिल हो सकता है. पंजाब का चुनाव पूनियां के लिए सिर्फ एक प्रदेश की जिम्मेदारी नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में अगले बड़े राजनीतिक पड़ाव का अवसर भी है.
वहीं, पंजाब में सचिन पायलट के सामने सबसे बडी चुनौती कांग्रेस को एकजुट करने की है. कांग्रेस ने उन्हें पंजाब का प्रभारी बनाकर भूपेश बघेल की जगह जिम्मेदारी दी है. यह बदलाव पंजाब कांग्रेस में जारी गुटबाजी और संगठनात्मक तनाव के बीच हुआ है. राजा वड़िंग और चरणजीत सिंह चन्नी के बीच नेतृत्व की जंग खुलकर सामने आ चुकी है. चन्नी के साथ सुखजिंदर सिंह रंधावा और प्रताप सिंह बाजवा जैसे वरिष्ठ नेताओं का खड़ा होना इस संघर्ष को और पेचीदा बनाता है.
ऐसे में पायलट के सामने सबसे बड़ी चुनौती आम आदमी पार्टी व भाजपा से मुकाबला करने से पहले कांग्रेस के भीतर चल रहे इस सियासी युद्ध को खत्म करना होगी. देखा जाए तो पंजाब में पायलट की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे कांग्रेस को एकजुट कर मजबूत विकल्प के रूप में खड़ा कर पाते हैं या नहीं.
पंजाब का चुनाव भले वहां की जनता लड़ेगी मगर इस मुकाबले पर नजरें राजस्थान की भी रहेंगी क्योंकि पंजाब के चुनावी रण में अब मुकाबला सिर्फ आप, भाजपा या कांग्रेस के बीच नहीं बल्कि पूनियां बनाम पायलट भी है.