
अपनों की बगावत
अलवर में वन राज्य मंत्री संजय शर्मा के धरने से फिर उभरे पुराने जख्म. राजस्थान की सियासत में अपनी ही सरकार को घेरने वाले नेताओं की लंबी फेहरिस्त
राजस्थान की भजनलाल सरकार में गत सप्ताह अलवर से जो तस्वीर सामने आई, वह सिर्फ नगर निगम में सफाई कर्मचारियों की नियुक्ति से जुड़ा मामलाभर नहीं थी. यह सत्ता के भीतर चल रही उस सियासी उठापटक की भी झलक है, जिसमें मंत्री और विधायक अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना देने से भी गुरेज नहीं करते. 12 अगस्त को अलवर में वन राज्य मंत्री संजय शर्मा सफाई कर्मचारियों की नियुक्ति का मामला लेकर नगर निगम परिसर में धरने पर बैठ गए. उन्होंने जिला कलक्टर और नगर निगम आयुक्त की कार्यशैली पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि पात्र अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र देने में अफसरशाही अड़ंगा लगा रही है. मामला करीब सात साल से लंबित था और 2012 की भर्ती से जुड़े अभ्यर्थी नियुक्ति का इंतजार कर रहे थे. मंत्री के धरने पर बैठने के कुछ ही घंटों बाद सरकार सक्रिय हुई और पांच सफाई कर्मचारियों को नियुक्ति पत्र दे दिए गए. बाकी पात्र अभ्यर्थियों को भी नियुक्ति देने का भरोसा दिया गया. इसके बाद मंत्री ने धरना समाप्त कर दिया. सवाल यह नहीं है कि सफाई कर्मचारियों को नियुक्ति पत्र मिले या नहीं. सवाल यह है कि जिस सरकार का हिस्सा मंत्री खुद हैं, उसी सरकार के खिलाफ उन्हें सड़क पर क्यों बैठना पड़ाॽ
वैसे भी राजस्थान की सियासत इस तरह के मामलों की आदी हो चुकी है क्योंकि हर साल कोई न कोई मंत्री, विधायक या जनप्रतिनिधि अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल देता है. कई बार ऐसे मौके आए हैं जब स्व. भैरोंसिंह शेखावत, अशोक गहलोत और वसुंधराराजे सहित अधिकांश मुख्यमंत्रियों को अपनों के ही विरोध का सामना करना पड़ा. राजस्थान में पिछले डेढ़ दशक के के सियासी घटनाक्रमों पर नजर डालें तो इस फेहरिस्त में कई ओर मामले जुड़ जाते हैं.
वसुंधरा राजे को अपने दोनों कार्यकालों में अपनों की बगावत का सामना करना पड़ा. उनके पहले कार्यकाल (2003-2008) में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. जसवंत सिंह, नरपत सिंह राजवी, घनश्याम तिवाड़ी, ललित किशोर चतुर्वेदी, मदन दिलावर, किरोड़ी लाल मीणा, गुलाबचंद कटारिया और कैलाश मेघवाल जैसे पार्टी के दिग्गज नेताओं ने उनके खिलाफ मोर्चा खोला. एक दौर ऐसा भी आया जब राजे और उनके विरोधियों के बीच गतिरोध खुलकर सामने आ गया और दोनों खेमे एक-दूसरे के खिलाफ जमकर बवाल काटते नजर आए.
अपनों की बगावत ने वसुंधराराजे के दूसरे कार्यकाल में भी उनका पीछा नहीं छोड़ा. हालांकि, इस दौरान कभी उनके विरोधी रहे गुलाब चंद कटारिया, मदन दिलावर, नरपत सिंह राजवी और कैलाश मेघवाल जैसे कुछ दिग्गज विरोधी उनके पाले में आ गए थे मगर घनश्याम तिवाड़ी से उकना छत्तीस का आंकड़ा बना रहा. उस दौरान घनश्याम तिवाड़ी लंबे समय तक अपनी ही सरकार और मुख्यमंत्री के खिलाफ मुखर रहे. 2017 में उन्होंने सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए और 2018 में विधानसभा के भीतर सरकार के विवादित ‘दंड विधिया राजस्थान संशोधन विधेयक’ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और उस विधेयक को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया. तिवाड़ी और सरकार के बीच विवाद इतना बढ़ा कि भाजपा ने उन्हें नोटिस जारी किया और तिवाड़ी ने पार्टी छोड़ दी. बाद में तिवाड़ी ने भारत वाहिनी नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली. हालांकि, 2018 के विधानसभा चुनाव में यह पार्टी कोई बड़ा कमाल नहीं कर पाई. तिवाड़ी खुद भी हारे और उनकी नई पार्टी के सभी उम्मीदवार भी परास्त हुए. वसुंधराराजे के दूसरे कार्यकाल में ही अलवर के रामगढ़ से भाजपा विधायक ज्ञानदेव आहूजा भी अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ गए थे. जुलाई 2017 में उन्होंने पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता के विरोध में धरना दिया और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नाम ज्ञापन सौंपा था. भाजपा ने उन्हें सरकार के खिलाफ धरना देने पर नोटिस जारी किया तो आहूजा ने वसुंधराराजे के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. यह विवाद इतना बड़ा कि ज्ञानदेव आहूजा को पार्टी छोड़नी पड़ी.
डॉ. किरोड़ी लाल मीणा की राजनीति तो राजस्थान में सत्ता के भीतर विपक्ष की लगभग अलग ही शैली बन चुकी है. वसुंधराराजे के पहले कार्यकाल में जब गुर्जर आंदोलन चरम पर था और गुर्जर समाज को एसटी में आरक्षण की अटकलें चल रही थी तो इसके विरोध में किरोड़ी लाल मीणा ने कैबिनेट मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. 2008 के चुनाव में डॉ. किरोड़ी लाल करौली जिले के टोडाभीम और उनकी पत्नी गोलमा देवी दौसा जिले की महुआ सीट से निर्दलीय विधायक चुनी गई. 2008 में वसुंधराराजे की हार में किरोड़ी को अहम फैक्टर माना गया क्योंकि पूर्वी राजस्थान में भाजपा को करारी शिकस्त मिली थी. इसी के चलते उनकी पत्नी गोलमा देवी को अशोक गहलोत सरकार में मंत्री पद मिला मगर डॉ. किरोड़ी अपने बगावती तेवर ज्यादा दिन नहीं संभाल पाए. पांच माह बाद ही गोलमा ने अशोक गहलोत सरकार से इस्तीफा दे दिया. 2013 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले किरोड़ी लाल मीणा नेशनल पीपुल्स पार्टी की शरण में चले गए और 2013 के विधानसभा चुनाव में अपनी पत्नी गोलमा सहित चार सीटों पर जीत हासिल की. 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने दौसा से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की. 2013 में वसुंधराराजे फिर मुख्यमंत्री बनीं तब भी डॉ. किरोड़ी लाल मीणा उनकी सरकार को विधानसभा में लगातार घेरते रहे. करीब 11 साल की दूरी के बाद 11 मार्च 2018 को उनकी भाजपा में फिर घर वापसी हुई. 2023 में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद डॉ. किरोड़ी लाल को भजनलाल सरकार में कृषि व ग्रामीण विकास विभाग की जिम्मेदारी मिली मगर वो इससे संतुष्ट नजर नहीं आए. भजनलाल सरकार में मंत्री बनने के बाद भी उनका तेवर नहीं बदला. 2024 में उन्होंने कृषि बीमा योजना में करीब 1146 करोड़ रुपये के संभावित घोटाले की आशंका जताई और अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए. बाद में उन्होंने एसआई भर्ती परीक्षा समेत कई मामलों पर भी सरकार की कार्यशैली को लेकर सार्वजनिक रूप से असहमति जताई. पिछले दिनों नकली खाद-बीज बनाने वाली कंपनियों पर बिना सरकार के संज्ञान में लाए छापामारी करना भी किराड़ी की इसी समानांतर सरकार चलाने की रणनीति का हिस्सा है. लोकसभा चुनाव की हार के बाद उन्होंनें करीब एक साल तक मंत्री पद से इस्तीफा देने का सियासी ड्रामा भी रचा मगर इस दौरान वो विभागीय कामकाज और सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल करते रहे.

सूबे के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके अशोक गहलोत के सामने भी कई ऐसे मौके आए हैं जब उन्हें कई बार अपनों के विरोध से दो चार होना पड़ा. मुख्यमंत्री नहीं बनाने से नाराज पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट पांच साल तक गहलोत की सरकार को घेरते रहे. जून-जुलाई 2020 में ऐसा भी मौका आया जब पायलट अपने 19 समर्थक विधायकों के साथ गहलोत सरकार गिराने हरियाणा के मानेसर पहुंच गए थे. पायलट के साथ मानेसर जाने वाले पूर्व मंत्री हेमाराम चौधरी भी अपने बगावती तेवर के लिए जाने जाते हैं. मंत्री रहते हुए हेमाराम ने 2010 और 2021 में अपनी ही सरकार को मुश्किलों में डाल दिया था. 2010 में उन्होंने रिफाइनरी की जगह और 2021 में मानेसर की घटना के बाद के सियासी घटपनाक्रम को लेकर अशोक गहलोत सरकार से इस्तीफा दे दिया था. सितंबर 2023 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले तत्कालीन खेल मंत्री अशोक चांदना बूंदी में बिजली और ट्रांसफार्मर की समस्या को लेकर अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने पर बैठ गए. उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारी उनकी सुनवाई नहीं कर रहे और भाजपा विधायकों की बात ज्यादा सुनी जा रही है. सरकार ने आनन-फानन में संबंधित अधिकारी को एपीओ किया और 100 ट्रांसफार्मर उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया. चांदना इससे पहले भी अपनी ही सरकार में अपनी स्थिति को लेकर सार्वजनिक नाराजगी जाहिर कर चुके थे. 2022 में उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर यहां तक कहा था कि उन्हें ऐसे 'जलालत भरे मंत्री पद' से मुक्त कर दिया जाए, क्योंकि उनके विभागों में भी अधिकारी ही फैसले कर रहे हैं.
2019 में कांग्रेस विधायक और पूर्व डीजीपी हरीश मीणा भी टोंक में ट्रैक्टर चालक की मौत के मामले को लेकर अपनी ही सरकार के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठ गए थे. मांगें मानने के आश्वासन के बाद उनका अनशन खत्म हुआ.
‘‘मंत्री-विधायकों का अपनी ही सरकार के खिलाफ खड़े होने की कई वजह हैं. अधिकांश मामलों में जनप्रतिनिधि प्रशासन की कार्यशैली को लेकर सवाल उठाते हैं. नेताओं को लगता है कि नौकरशाही उन्हें पर्याप्त महत्व नहीं दे रही है या फिर उनके काम काज में रोड़ा अटका रही है, ऐसे में धरने व बयानों के जरिए वो अपनी सियासी ताकत का अहसास कराते हैं. चुनावी राजनीति भी बगावत का अहम कारण बनती है क्योंकि नेता अपने क्षेत्र की जनता को यह संदेश देना चाहते हैं कि उनके मुद्दों को लेकर वो अपनी सरकार से भी टकरा सकते हैं.’’
देखा जाए तो पिछले डेढ़ दशक की ये घटनाएं कुछ और कहानी कहती हैं. सत्ता और चेहरे बदलते रहते हैं, मगर सत्ता के भीतर अपनी ही सरकार से लड़ने की तस्वीर नहीं बदलती. राजस्थान में ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या को केवल नेताओं की 'बगावत' कहकर खारिज करना भी आसान नहीं होगा क्योंकि अगर अपनी ही सरकार में काम कराने के लिए मंत्री को धरने पर बैठना पड़े तो फिर सवाल उठना लाजमी है कि आखिर सरकार चला कौन रहा है मंत्री, मुख्यमंत्री या अफसरशाही?