
नशे के खिलाफ इंकलाब
2025 गांव और 17 हजार से ज्यादा लोगों ने सामूहिक उपवास रखकर लिखा नशा मुक्ति का संकल्प
नशे को हराने के लिए नशा करने वाले लोगों को नहीं सामाजिक स्वीकार्यता देने वाली सोच को भी बदलना होगा. शादी-ब्याह में मनुहार और मेल-मिलाप की परंपराओं तक सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बन चुके नशे को हराने के लिए राजस्थान के एक प्रोफेसर और उनकी पत्नी का संकल्प और पहल खासा असर दिखा रही है.
बीकानेर से शुरू हुए इस ‘लोक संकल्प’ अभियान से प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर के लोग जुड़ रहे हैं. महज कुछ दिनों में ही 2,025 गांवों और कस्बों के 17,002 लोगों ने एक दिन का सामूहिक उपवास रखकर नशे को सामाजिक स्वीकृति नहीं देने का संकल्प लिया है.
बीकानेर के राजकीय डूंगर महाविद्यालय में समाजशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर और नवीन नशामुक्ति केंद्र के संयोजक प्रो. श्यामसुंदर ज्याणी ने शिक्षक दिवस 5 सितंबर को ‘लोक संकल्प—नशे की सामाजिक स्वीकृति के विरुद्ध जन-आंदोलन’ की यह पहल शुरू की थी. प्रो. ज्याणी ने इसे केवल भाषणों और जागरूकता संदेशों तक सीमित रखने के बजाय खुद 28 दिन के उपवास का संकल्प लिया. उनकी पत्नी कविता भी इस पहल में उनके साथ रहीं.

शिक्षक दिवस से गांधी जयंती तक चलने वाली इस यात्रा को ‘गुरु से गांधी तक’ नाम दिया गया. इस पहल का पहला बड़ा पड़ाव 21 सितंबर को तेजा दशमी पर आया. अभियान के मुताबिक, इस दिन 800 से अधिक गांवों में लोगों ने एक दिन का उपवास रखकर नशे के खिलाफ सामूहिक संकल्प लिया.
इसके बाद 28 सितंबर को भगत सिंह जयंती पर ‘इंकलाब 28’ के माध्यम से अभियान ने व्यापक भागीदारी का दावा किया. अब तक इस अभियान में राजस्थान के सभी 41 जिलों के अलावा देश के 15 राज्यों और पांच देशों से भी लोगों ने अपनी भागीदारी व सामूहिक उपवाश रखकर नशे को हराने का संकल्प लिया.
शिक्षक दिवस से गांधी जयंती तक चलने वाली इस यात्रा को ‘गुरु से गांधी तक’ नाम दिया गया. इस पहल का पहला बड़ा पड़ाव 21 सितंबर को तेजा दशमी पर आया. अभियान के मुताबिक, इस दिन 800 से अधिक गांवों में लोगों ने एक दिन का उपवास रखकर नशे के खिलाफ सामूहिक संकल्प लिया.
इसके बाद 28 सितंबर को भगत सिंह जयंती पर ‘इंकलाब 28’ के माध्यम से अभियान ने व्यापक भागीदारी का दावा किया. अब तक इस अभियान में राजस्थान के सभी 41 जिलों के अलावा देश के 15 राज्यों और पांच देशों से भी लोगों ने अपनी भागीदारी व सामूहिक उपवाश रखकर नशे को हराने का संकल्प लिया.
‘’नशे के खिलाफ लड़ाई तभी व्यापक हो सकती है जब समाज नशे को स्वीकार करने वाली अपनी आदतों और परंपराओं पर भी विचार करे. जब हजारों परिवार सार्वजनिक रूप से यह संकल्प लेते हैं कि वे नशे को सामाजिक स्वीकृति नहीं देंगे तो यह व्यक्तिगत प्रतिज्ञा से आगे बढ़कर सामाजिक मानदंडों को बदलने की सामूहिक अभिव्यक्ति बन जाती है.’’
लोक संकल्प में नशे से दूर रहने की शपथ के साथ बेहतर अभिभावकत्व (गुड पेरेंटिंग), शिक्षक-अभिभावक सहयोग, सकारात्मक युवा गतिविधियों, सामुदायिक संवाद और नशामुक्त सामाजिक आयोजनों पर जोर दिया गया है. खेल, अध्ययन, कला, प्रकृति, कौशल विकास और सामाजिक सेवा जैसी गतिविधियों के जरिए युवाओं को सकारात्मक विकल्पों से जोड़ना भी इस पहल का हिस्सा है. जरूरतमंद लोगों को परामर्श और पुनर्वास सेवाओं से जोड़ने पर भी ध्यान दिया जा रहा है. इस अभियान को आगे बढ़ाने में शिक्षकों, विद्यार्थियों और स्वयंसेवी युवाओं की भूमिका अहम रही है. प्रो. ज्याणी के आह्वान पर राजस्थान शिक्षक संघ और राजस्थान शिक्षक संघ (प्रगतिशील) से जुड़े सैकड़ों शिक्षकों ने अपने क्षेत्रों में लोगों तक संदेश पहुंचाया. विद्यार्थियों और उनके पर्यावरणीय अभियान ‘पारिवारिक वानिकी’ से जुड़े युवाओं ने भी गांव-गांव संपर्क किया.
अब तक इस अभियान के तहत 500 से ज्यादा लोक संकल्प सभाएं आयोजित की जा चुकी हैं और दो लाख से अधिक लोग इसकी विभिन्न गतिविधियों से जुड़ चुके हैं. इसके साथ ही नशे की रोकथाम, सामाजिक स्वीकृति, परिवार की भूमिका और बेहतर अभिभावकत्व जैसे विषयों पर हिंदी में 16 ज्ञान पुस्तिकाएं भी तैयार की गई हैं.
नशे की प्रवृत्ति पर शतत वार करने के लिए लोक संकल्प की वेबसाइट LokSankalp.org को पंजीकरण, जानकारी और सामुदायिक भागीदारी के मंच के रूप में विकसित किया गया है. इसके रियल-टाइम डैशबोर्ड पर अलग-अलग गांवों, जिलों, राज्यों और देशों से जुड़ने वाले लोगों की जानकारी दर्ज है. 2 अक्टूबर को गांधी जयंती पर भी नशे के खिलाफ बड़ी तादाद में सामूहिक उपवास और संकल्प सभाओं का आयोजन हुआ. इस अभियान के अगले चरण में चुनिंदा गांवों में नशे की रोकथाम के लिए एक साल का सतत सामुदायिक कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी है. इसमें शिक्षक, अभिभावक, विद्यार्थी और स्थानीय समुदाय मिलकर युवाओं के लिए सकारात्मक गतिविधियों, नशामुक्त सामाजिक व्यवहार, पारिवारिक संवाद तथा जरूरतमंद लोगों को परामर्श और पुनर्वास से जोड़ने पर काम करेंगे.
‘‘कानून नशीले पदार्थों की उपलब्धता पर अंकुश लगाने और उपचार नशे पर निर्भर लोगों की मदद करने में भूमिका निभा सकते हैं, मगर नशे की शुरुआत से पहले समाज की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. यदि परिवार, शिक्षक, मित्र समूह और समुदाय नशे को स्वीकार करने वाली सामाजिक प्रवृत्तियों से दूरी बनाएं और युवाओं के सामने सकारात्मक विकल्प रखें तो रोकथाम की साझा जिम्मेदारी विकसित हो सकती है.’’
फिलवक्त लोक संकल्प के शुरुआती आंकड़े इसकी पहुंच और सामुदायिक भागीदारी की सफलता की तस्वीर पेश करते हैं. एक दंपती के व्यक्तिगत उपवास से शुरू हुई यह कोशिश नशे के खिलाफ सामाजिक सहमति बनाने और समुदाय को बदलाव का सक्रिय भागीदार बनाने का एक नया प्रयोग बनकर सामने आई है.
