
सांसदों, विधायकों की तरह हो सरपंच निधि
महात्मा गांधी ने कहा था - भारत की आत्मा गांवों में बसती है और देश की तरक्की की राह गांवों से होकर गुजरती है मगर राजस्थान की ग्राम पंचायतों की आज की तस्वीर देखकर गांधी के ग्राम स्वराज की यह बुनियाद कमजोर पड़ती नजर आ रही है.
महात्मा गांधी ने कहा था - "भारत की आत्मा गांवों में बसती है और देश की तरक्की की राह गांवों से होकर गुजरती है." इसी विचार को साकार करने के उद्देश्य से राजस्थान के नागौर से पंचायतीराज व्यवस्था की नींव रखी गई जिसमें ग्राम पंचायतों को ग्रामीण विकास की सबसे मजबूत कड़ी माना गया मगर आज सात दशक बाद यह तस्वीर चिंताजनक नजर आती है. जिस ग्राम स्वराज की कल्पना गांधी ने की थी, अब उसकी बुनियाद कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है. पंचायतों के घटते अधिकार, सीमित संसाधन, वित्तीय संकट और बढ़ते राजनीतिक व प्रशासनिक हस्तक्षेप ने गांवों के विकास की रफ्तार को प्रभावित किया है.
क्या आज पंचायतें वास्तव में उतनी ही सशक्त हैं जितनी 73वें संविधान संशोधन के समय कल्पना की गई थी? क्या सरपंच अपने अधिकारों का स्वतंत्र रूप से उपयोग कर पा रहे हैं या फिर राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप ने उनकी भूमिका को सीमित कर दिया है?
पंचायतों का घटता बजट, चुनावों में हो रही देरी, वित्तीय संकट, महिलाओं की वास्तविक भागीदारी और सरपंचों की सामाजिक सुरक्षा जैसे कई गंभीर मुद्दे आज चर्चा के केंद्र में हैं. इन्हीं विषयों पर राजस्थान सरपंच संघ के अध्यक्ष बंशीधर गढ़वाल से 'पंचायत स्वर' ने विस्तार से बातचीत की. पेश हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:
· हर सरकार पंचायतों के विकास और बदलाव के बड़े-बड़े दावे करती है, इन दावों का सच क्या हैॽ
गांवों के विकास के दावे सिर्फ जुमलेबाजी हैं. सरपंचों को अपनी हर समस्या के लिए लड़ना पड़ता है. हर सरकार समय-समय पर नए कानून बनाकर या पुराने कानून में संशोधन करके सरपंचों के अधिकारों में कटौती करती रहती है. ग्राम सभा को बहुत कमजोर बना दिया गया है, उनके फैसलों की पालना नहीं होती. सरकार और अफसर पंचायतों की जमीनों व संसाधनों की मनमर्जी से बंदरबांट कर रह हैं, ऐसे निर्णयों में पंचायतों की राय तक नहीं ली जाती.
· पंचायतों पर नेताओं और अफसरों का कितना दबाव हैॽ
पंचायतों पर विधायकों व अधिकारियों का दबाव बहुत बढ़ गया है. विधायक पंचायत के हर फैसले में दखलंदाजी करने लगे हैं. विधायक कोष, सांसद कोष और अन्य विकास कार्यों की कार्यकारी एजेंसी ग्राम पंचायत होनी चाहिए मगर एमएलए, प्रधान और जिला परिषद अपनी मनमर्जी से कभी पंचायत समिति, कभी पीडब्ल्यूडी, कभी जिला परिषद को कार्यकारी एजेंसी घोषित कर देते हैं जिसके कारण पंचायतों में होने वाले कार्यों की गुणवत्ता और अन्य कमियों पर सरंपचों का कोई वश नहीं चलता. आबादी लगातार बढ़ रही है मगर पंचायतों के बजट में लगातार कटौती हो रही है. पहले पंचायतों को राज्य के कुल बजट का 7 प्रतिशत हिस्सा मिलता था मगर 15वें वित्त आयोग में इसे 6.8 कर दिया गया. हमारी लड़ाई के बाद इसे 6.9 किया गया मगर यह अभी भी बहुत कम है. पंचायतों को कम से कम 10 प्रतिशत हिस्सा तो मिलना ही चाहिए.
· पंचायत चुनाव में देरी क्यों हो रही हैॽ
राजस्थान में इससे पहले पंचायत-निकाय चुनाव में इतनी देरी कभी नहीं हुई. पहले सरकार ने वन स्टेट- वन इलेक्शन के नाम पर पंचायत चुनावों को अटकाए रखा, फिर परीसिमन और अन्य बातों के कारण चुनाव टाले जाते रहे. सरकार पंचायतों में अफसरों को प्रशासक लगाने जा रही थी मगर हमारे संघ के दखल के बाद सरपंचों को प्रशासक लगाया गया.
· चुनाव में देरी का क्या असर हुआॽ
चुनाव में देरी के कारण पंचायतों को मिलले वाला बजट और अनुदान प्रभावित हुआ है. केंद्र ने अपना बजट रोक दिया है. केंद्र का बजट जनवरी 2026 के बाद से जारी नहीं हुआ है. कोरोना काल के समय रोका गया बजट भी अब तक जारी नहीं किया गया है. पिछले डेढ़ साल से गांवों के विकास कार्य ठप्प पड़े हैं.
· सरपंचों का मानदेय क्या मनरेगा मजदूर से भी कम हैॽ
हां, यह सच है कि सरपंच को 24 घंटे काम के बाद भी मनरेगा श्रमिक से कम मानदेय मिलता है. सांसद-विधायक तो बिल लाकर जितने चाहें अपने वेतन-भत्ते बढ़ा लेते हैं मगर सरपंचों को तो मानदेय के लिए सरकार की दया पर निर्भर रहना पड़ता है. सरपंच को इस समय 6400 रुपए महीना मानदेय दिया जाता है जो बहुत कम है. यह मानदेय भी हमें लंबे संघर्ष के बाद हासिल हुआ है. हमने सरकार से सरपंचों का मानदेय कम से कम 15 से 20 हजार रुपए करने की मांग की है. पूर्ववर्ती सरकार ने हमारा मानदेय हर साल 10 फीसदी बढ़ाने का वादा किया था मगर यह महंगाई के लिहाज से देखें तो यह कुछ भी नहीं है. ऐसे में सरकार को चाहिए कि हमारे मानदेय में हर साल कम से कम 25 फीसदी बढ़ोतरी करे.
· सरपंचों को कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं हैॽ
यह बात सही है कि सरपंचों को बीमा, पेंशन जैसी किसी सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता. विधायक और सांसद जितनी बार चुने जाते हैं उसी अनुपात में उनकी पेंशन बढ़ती जाती है, उनके पूरे परिवार के लिए चिकित्सा और अन्य सुविधाएं निशुल्क मिलती हैं जबकि लोकतंत्र की सबसे अहम कड़ी होने के बावजूद सरपंचों को कोई सुविधा नहीं मिलती. सरपंचों को कम से कम 10 हजार रुपए पेंशन मिलनी चाहिए.
· क्या सियासी आधार पर सरपंचों को पद से हटाया जाता हैॽ
संविधानिक प्रक्रिया के तहत सरपंचों का चुनाव राजनीतिक चिन्ह के आधार पर नहीं होता. इसके बावजूद सरपंचों को हमेशा राजनीतिक आधार पर टार्गेट किया जाता है. देखा जाए तो सरपंच का चुनाव ही असली लोकतंत्र है क्योंकि उसमें कोई पार्टी, गुट या अन्य चीजों की जगह सरपंच के व्यवहार, काम, मुद्दों के आधार पर वोट मिलता है. ऐसे में उन्हें राजनीतिक आधार पर हटा दिया जाना लोकतंत्र पर सीधा हमला है.
· महिलाओं की पंचायतों में 50 फीसदी हिस्सेदारी के बावजूद सरपंच पति काम देखते हैं, आपका संघ इसको लेकर आवाज क्यों नहीं उठाताॽ
हमारी हर मीटिंग में इन बातों पर चर्चा होती है कि महिलाओं को अपना काम खुद संभालना चाहिए. शिक्षा और जागरुकता के कारण बहुत सुधार भी हुआ है, राजस्थान में बहुत सारी महिला सरपंच अपने स्तर पर बहुत अच्छा काम कर रही हैं और देश-दुनिया में राजस्थान का नाम गौरवान्वित कर रही हैं. अभी भी कुछ जगह सरपंच पति या गांव के दबंग लोगों द्वारा काम संभाले जाने की शिकायतें मिलती रहती हैं जिसमें सुधार बहुत जरुरी है.
· पंचायतों के वित्तीय और प्रशासनिक हालात कैसे हैंॽ
सरकार पंचायतों को आबादी के अनुसार वित्तीय सहायता देती है. अभी 2000 की आबादी वाली पंचायत को सालाना 10 लाख रुपए मिलते हैं. इस राशि में पानी, बिजली, सफाई और अन्य जरुरी काम ही नहीं हो सकते. ऐसे में विकास कार्य कहां से होंगे. नगरीय निकाय अपने पैसे की भरपाई यूजर चार्ज और अन्य टैक्स लगाकर कर लेते हैं, पंचायतों के पास तो वह भी अधिकार नहीं है. 73वें संविधान संशोधन में 29 विषय पंचायतों को सौंपे जाने का प्रावधान था मगर अब तक सिर्फ 5 विषय (कृषि, प्रारंभिक शिक्षा, पेयजल, प्राथमिक स्वास्थ्य, सफाई और महिला व बाल विकास) ही पंचायतों को मिले हैं वो भी आधे-अधूरे.