
जनमत छोटा, जुगाड़ बड़ा!
निकायों की क्रोनोलॉजी समझिए...पहले आधा-अधूरा जनादेश, फिर बाड़ेबंदी...फिर पुलिस, मुकदमे, बुलडोजर का भय और आखिर में 148 की जगह 199 में बना ली अपनी सरकार.
राजस्थान के निकाय चुनाव में मतदाताओं ने अपना फैसला 14 सितंबर को ही सुना दिया था. मगर कई निकायों में असली सियासी मुकाबला नतीजे आने के बाद शुरू हुआ. 309 निकायों में 46 निकाय ऐसे थे जहां कांग्रेस व भाजपा से ज्यादा निर्दलीयों पार्षदों ने बाजी मारी. ऐसे में अपना बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीयों और दूसरे खेमे के पार्षदों को साधने की कवायद शुरू हुई. इसके साथ ही आरोपों का एक ऐसा अनगिनत सिलसिला सामने आया जिसमें पुलिस और प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई.
तस्वीर को समझने के लिए चुनाव परिणाम का गणित देखना जरूरी है. 309 शहरी निकायों के 10,244 वार्डों में भाजपा को 4,179, कांग्रेस को 3,613 और निर्दलीयों को 2,273 सीटें मिलीं. प्रदेश में 172 निकाय ऐसे थे जिनमें भाजपा और कांग्रेस को अपना बोर्ड बनाने के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हुआ. यहां निकायों में बोर्ड गठन का फैसला सीधे तौर पर निर्दलीय और छोटे दलों के पार्षदों पर निर्भर हो गया.
भाजपा 148 निकायों में सबसे बड़ी पार्टी रही, जबकि कांग्रेस 104 में सबसे बड़ी पार्टी रही. वोट शेयर का अंतर भी बहुत बड़ा नहीं था. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक भाजपा को 35.18 प्रतिशत और कांग्रेस को 34.24 प्रतिशत वोट मिले. दोनों के बीच अंतर महज 0.94 प्रतिशत रहा. यानी जनादेश बंटा हुआ था. मगर बोर्डों की कुर्सियों पर मुकाबला एकतरफा बनाने की राजनीतिक कोशिशों के आरोप सामने आने लगे.
अजमेर, भरतपुर और पाली नगर निगम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. 80 सदस्यीय अजमेर नगर निगम में कांग्रेस के 37, भाजपा के 32 और निर्दलीय 11 पार्षद जीते. बहुमत का आंकड़ा 41 था. इसी तरह 65 सदस्यीय पाली नगर में कांग्रेस को 29 और भाजपा को 21 वार्डों में जीत मिली. यहां भी बाजी 15 निर्दलीयों के हाथ थी. 65 वार्डों वाली भरतपुर नगर निगम में भाजपा को 20, कांग्रेस को 7 और निर्दलीयों को 37 वार्डों में जीत मिली. इन तीनों नगर निगम में निर्दलीय पार्षद निर्णायक बन गए. इसके बाद पार्षदों की बाड़ाबंदी और उसमें सेंध लगाने की जुगत शुरू हुई.
झुंझुनूं के मंडावा, नागौर के कुचेरा, अलवर के तिजारा, झालावाड़, उदयपुर के वल्लभनगर, गंगानगर के रायसिंहनगर सहित प्रदेश के विभिन्न इलाकों से ऐसी खबरें आई जिसने पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठा दिए. मंडावा में एक होटल में ठहरे कांग्रेस पार्षदों के बीच पुलिस एक पार्षद को उठाने पहुंच गई तो तिजारा में राजस्थान ही नहीं बल्कि हरियाणा पुलिस भी कांग्रेसी पार्षदों का रास्ता रोकती नजर आई.
पुलिस की भूमिका इसलिए भी संदेह के घेरे में आ गई क्योंकि प्रदेशभर में सत्ताधारी पार्टी का साथ नहीं देने वाले करीब 150 पार्षदों के पुराने मुकदमें, अतिक्रमण और अन्य मामलों की फाइल खुल गई. इतना ही नहीं कई जगह इन पार्षदों के मकान और प्रतिष्ठानों को तोड़ने के लिए बुलडोजर तक पहुंच गए.
बीकानेर और कुचेरा में चुनाव में जीत हासिल करने वाले पार्षदों की गिरफ्तारी की कोशिश हुई तो अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा. बीकानेर में तो आधी रात को अदालत के दरवाजे खुले. कुचेरा में भी पार्षद को अदालत से राहत मिली. 21 सितंबर से पहले की रात राजस्थान हाईकोर्ट में असाधारण स्थिति बनी.
हनुमानगढ़ के 9 पार्षदों और बीकानेर के एक पार्षद की गिरफ्तारी की आशंका को लेकर देर रात विशेष सुनवाई हुई. रिपोर्टों के मुताबिक सुनवाई रात 10 बजे शुरू हुई और आधी रात के बाद तक चली. एक मामले में सुनवाई करीब रात 2 बजे तक चली और अदालत ने गिरफ्तारी से अंतरिम राहत दी.
बीकानेर के पार्षद मकसूद अहमद के मामले में याचिका में यह आशंका जताई गई थी कि पुराने मामले में पुलिस की कार्रवाई से उनका चुनाव में मतदान प्रभावित हो सकता है. अदालत ने गिरफ्तारी पर रोक लगाई. पुलिस ने तो अहमद को वोट डालने से रोकने की पूरी पटकथा तैयार कर ली थी मगर अदालत ने इस पर पानी फेर दिया. श्रीगंगानगर के श्रीविजयनगर में पार्षद विजय कुमार के कथित अपहरण का मामला राजस्थान हाईकोर्ट तक पहुंच गया.
ये सिर्फ एक या दो कानूनी घटना नहीं है. यह उस चुनावी माहौल का संकेत है जिसमें निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपने मतदान के अधिकार को लेकर अदालत की शरण लेनी पड़ी. उदयपुर जिले की फतहनगर नगरपालिका में भाजपा के बागी पार्षद राजेश चपलोत को पुराने एससी, एसटी मामले में गिरफ्तार किए जाने के बाद चेयरमैन चुनाव के दौरान पुलिस कस्टडी में मतदान के लिए लाया गया. अगले दिन उपाध्यक्ष चुनाव में भी उन्हें पुलिस सुरक्षा में मतदान के लिए लाया गया.
अलवर के तिजारा में कांग्रेस पार्षदों के हरियाणा में रोके जाने को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए. वार्ड 18 की पार्षद हेमलता ने आरोप लगाया कि पुलिस और कुछ लोगों ने उन्हें जबरन रोका, महिलाओं और बच्चों के साथ दुर्व्यवहार हुआ और लोगों को बंदूक की नोक पर रखा गया.
देखा जाए तो निकाय चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी मगर जीत उतनी बड़ी नहीं थी जितना कि दावा किया जा रहा था. भाजपा 148 निकायों में सबसे बड़ी पार्टी रही, जबकि कांग्रेस 104 में सबसे बड़ी पार्टी रही. बोर्ड बनाने की बारी आई तो भाजपा ने 301 निकायों में से 199 में अपने बोर्ड बनाए, जबकि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद 94 निकायों में ही अपना बोर्ड बना पाई.
लोकतंत्र की असली परीक्षा सिर्फ यह नहीं है कि अध्यक्ष या मेयर किस दल का बना. असली परीक्षा यह है कि क्या पार्षद बिना डर के वोट कर सके? क्या किसी पुराने मुकदमे का इस्तेमाल चुनावी दबाव के लिए नहीं हुआ? क्या पुलिस ने हर दल के पार्षद के साथ एक जैसा व्यवहार किया? क्या प्रशासन ने राजनीतिक पहचान देखे बिना कानून लागू किया? क्या निर्दलीय पार्षद अपना निर्णय स्वतंत्र रूप से कर सके?
लोकतंत्र में पुलिस का काम किसी पार्टी का बोर्ड बनाना नहीं है. उसका काम कानून की पालना करना है. अगर किसी पार्षद के अपहरण की शिकायत है तो पुलिस को जांच करनी चाहिए. अगर कोई अपराध हुआ है तो कार्रवाई होनी चाहिए. लेकिन उसी कार्रवाई की टाइमिंग, प्रक्रिया और निष्पक्षता पर सवाल उठें तो जवाब भी सार्वजनिक होना चाहिए. जब पुलिस की कार्रवाई से बचने के लिए निर्वाचित प्रतिनिधि आधी रात अदालत पहुंचें और अदालत आधी रात को खुले, तो सवाल सिर्फ पार्षद का नहीं रह जाता. सवाल पूरी चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता का हो जाता है. क्योंकि कुर्सी किसी की भी हो सकती है, मगर पुलिस और प्रशासन अगर सत्ता के साथ खड़े दिखाई देने लगें तो चोट किसी एक दल को नहीं, लोकतांत्रिक भरोसे को लगती है.
