
चौपालों की जगह मोबाइल स्क्रीन पर लड़ा जा रहा है गांवों का सियासी रण
गांवों में चुनाव का बदल गया दौर, चौपालों की जगह अब डिजिटल माध्यमों पर ज्यादा जोर, सियासी गीत भी बने चुनाव प्रचार का हथियार
राजस्थान के गांवों में चुनावी माहौल किस तरह रंग पकड़ चुुुका है, इसकी एक झलक भीलवाड़ा जिले के आसींद क्षेत्र के मोड़ का निंबाड़ा गांव में दिखाई देती है. यहां महिलाएं पारंपरिक लोकगीत गाकर चुनावी माहौल बना रही हैं. गांव की यह तस्वीर बता रही है कि पंचायत चुनाव अब केवल प्रत्याशियों के जनसंपर्क तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप, लोक परंपराओं और डिजिटल प्रचार का भी हिस्सा बनते जा रहे हैं. मोड़ का निंबेड़ा की यह बदली हुई तस्वीर अलग ही चुनावी रंगत घोल रही है. अब तक पंचायत चुनावों की कमान पुरुषों के हाथ में रहती थी मगर इस बार आदिवासी महिलाएं भी बढ़-चढ़कर चुनाव में हिस्सेदारी कर रही हैं. इन महिलाओं ने स्थानीय बोली में कुछ ऐसे गीत तैयार किए हैं जो चुनावी रंगत को ओर निखार रहे हैं. पारंपरिक लोकगीतों की तर्ज पर बनाए गए ये चुनावी गीत में चुनावी अहमियत बताने के साथ ही चुनावों में बढ़ते धनबल और बाहुबल पर करारा प्रहार भी कर रहे हैं.
मोड़ का निंबेड़ा ही नहीं पूरे इलाके में इस बार कुछ ऐसी ही चुनावी रंगत नजर आ रही है. इस अनूठे अंदाज की चर्चा के बीच राजस्थान के गांवों में चौपालों से लेकर मोबाइल स्क्रीन तक चुनावी सरगर्मी तेज होने लगी है. पंचायती राज चुनाव की आहट के साथ ही गांवों की गलियों, चौराहों, चौपालों और चाय की थड़ियों पर सियासी चर्चाओं का दौर तेज हो गया है. कहीं संभावित प्रत्याशियों की ताकत का आकलन हो रहा है, तो कहीं जातीय और सामाजिक समीकरणों के साथ पुराने चुनावी नतीजों का हिसाब-किताब लगाया जा रहा है. शाम ढलते ही चौपालों पर जमने वाली महफिलों में अब खेती-किसानी और गांव की समस्याओं के साथ चुनावी जीत-हार भी चर्चा का बड़ा मुद्दा बन गई है.
देखा जाए तो राजस्थान की ग्रामीण राजनीति का अपना अलग मिजाज है. यहां रिश्ते, रजामंदी, सामाजिक प्रतिष्ठा, पुरानी अदावतें और व्यक्तिगत संपर्क चुनावी समीकरणों को प्रभावित करते हैं. सरपंच से लेकर पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य तक के चुनाव में स्थानीय पहचान और मतदाताओं से सीधा जुड़ाव अहम माना जाता है. यही वजह है कि चुनाव नजदीक आते ही गांवों में राजनीतिक हलचल बढ़ने लगती है.
इस बार चुनावी प्रचार के तौर-तरीकों में तकनीक की भूमिका भी साफ नजर आ रही है. पहले जहां प्रत्याशियों का प्रचार घर-घर संपर्क, नुक्कड़ बैठकों, चौपालों और व्यक्तिगत मुलाकातों तक सीमित रहता था, वहीं अब मोबाइल फोन भी प्रचार का बड़ा माध्यम बन गया है. फेसबुक, व्हाट्सऐप और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रत्याशियों के जनसंपर्क, समर्थकों की अपील, चुनावी संदेश, वीडियो और प्रचार गीत साझा किए जा रहे हैं. कहीं पुराने जनप्रतिनिधियों के कामकाज की चर्चा है, तो कहीं नए दावेदार अपनी योजनाओं और वादों के जरिए मतदाताओं को आकर्षित करने में जुटे हैं. एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंचने वाली चुनावी चर्चा अब कुछ ही मिनटों में मोबाइल स्क्रीन पर भी पहुंच रही है.

चुनावी मुकाबले का एक दूसरा मोर्चा सोशल मीडिया पर भी खुलता नजर आ रहा है. प्रत्याशियों के समर्थक अपने-अपने उम्मीदवारों के पक्ष में माहौल बनाने में जुटे हैं. पोस्ट, वीडियो और टिप्पणियों के जरिए उपलब्धियों का बखान किया जा रहा है, तो विरोधियों के दावों पर सवाल भी उठाए जा रहे हैं. डिजिटल प्रचार ने प्रत्याशियों को कम समय में अधिक लोगों तक पहुंचने का अवसर दिया है. उम्मीदवारों से काम का हिसाब भी अब ऑनलाइन ही मांगा जा रहा है. सड़क और नाली निर्माण, स्वच्छता, स्कूलों की स्थिति, स्वास्थ्य सुविधाएं, किसानों की समस्याएं, युवाओं के लिए अवसर और सरकारी योजनाओं का लाभ जैसे सवाल अब अब ग्रामीण मतदाता खुलकर पूछ रहे हैं. चुनावी चर्चाओं में प्रत्याशियों के वादों के साथ उनके पिछले कामकाज और गांव के विकास में योगदान पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं.
राजस्थान के गांवों में चुनावी सरगर्मी बढ़ने के साथ प्रत्याशियों की भागदौड़ भी तेज होने लगी है. कोई घर-घर पहुंचकर समर्थन मांग रहा है, तो कोई बैठकें कर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है. चौपालों पर चर्चाओं का दौर है, मोबाइल पर प्रचार की होड़ है और हर दावेदार अपनी जीत के दावे कर रहा है.
चुनावी शोर, समर्थकों की सक्रियता और जीत के दावों से अलग लोकतंत्र की असली ताकत मतदाता के विवेक में है. गांव की सरकार किसके हाथ में जाएगी, इसका फैसला अंततः मतपेटी में दर्ज मत ही करेंगे. चुनावी चौपाल से उठती चर्चाओं और मोबाइल स्क्रीन पर चल रही प्रचार की जंग के बीच अब निगाहें इस बात पर हैं कि मतदाता किसे गांव की बागडोर सौंपते हैं.
