
कर्ज माफी का अमृतकाल
हास-परिहास
देश में कर्जदार होना कोई अपराध नहीं है बस शर्त इतनी है कि आप गरीब घर में पैदा ना हुए हों. अगर आप किसान हैं और बैंक का एक हजार रुपया भी समय पर नहीं चुका पाए तो समझ लीजिए कि अब आपकी इज्जत, जमीन और नींद तीनों खतरे में हैं. पहले बैंक का नोटिस आएगा, फिर तहसील के चक्कर शुरू होंगे और अंत में कोई कर्मचारी नीलामी या कुर्की का कागज थामे आपके घर और खेत के बाहर खड़ा होगा.
गरीब ने अगर दो वक्त की रोटी, बेटी की शादी या बीमार मां के इलाज के लिए कर्ज लिया है तो उसका सार्वजनिक बदनाम होना पक्का है. 5-10 हजार का कर्ज नहीं चुका पाने पर उसके घर और जमीन की नीलामी की तैयारी होगी. सब उसे इस तरह देखेंगे जैसे कि जैसे उसने बैंक का पैसा नहीं, देश की संप्रभुता गिरवी रख दी हो. मगर बड़े लोगों की दुनिया कुछ अलग होती है. उनकी कर्ज की रकम बढ़ते-बढ़ते हजारों करोड़ तक पहुंच जाए तो बैंक के नोटिसों की भाषा भी बदल जाती है. वहां वसूली को वसूली नहीं कहा जाता, समाधान प्रक्रिया कहा जाता है. कर्ज माफी को माफी नहीं कहा जाता, वित्तीय पुनर्गठन कहा जाता है. घाटे को हेयरकट कहा जाता है और हजारों करोड़ रुपए हवा हो जाएं तो बताया जाता है कि यह अर्थव्यवस्था की मजबूरी है.
घसीटाराम को अब समझ आ गया है कि इस देश में कर्ज की भी जाति होती है.
गरीब का कर्ज कर्ज होता है, किसान का कर्ज अपराध होता है, मजदूर का कर्ज शर्म होता है और बड़े आदमी का कर्ज वित्तीय संकट कहलाता है. गरीब बैंक से कहे कि इस साल फसल खराब हो गई तो उसके सामने नियम रख दिए जाते हैं. बड़ा कारोबारी कारोबार में संकट का हवाला दे तो पूरा तंत्र फाइलें खोलकर उसकी मदद के लिए बैठ जाता है. गरीब डिफॉल्टर कहलाता है, बड़े लोग वित्तीय चुनौतियों से गुजर रहे होते हैं.
पिछले दिनों एक बड़े उद्योगपति से जुड़े करीब 22 हजार करोड़ रुपए के कर्ज के निपटारे की खबरों ने देश के आम आदमी को फिर याद दिलाया कि इस देश में कर्ज की रकम से ज्यादा महत्वपूर्ण कर्जदार की हैसियत है. जहां हजारों करोड़ रुपए के मामले में समझौते और भारी कटौती संभव हैं वहां किसी किसान की छोटी सी किस्त के लिए बैंक की पूरी मशीनरी सक्रिय हो जाती है.
रामलाल किसान की फाइल पर लिखा होता है - तत्काल वसूली, नोटिस, कुर्की, नीलामी. सिंघानियां, जिंदल, दारुवाला, पुनावाला, चंद्रा, पुरी, अडानी, अंबानी जैसे सरनेम वाले किसी बड़े कारोबारी की फाइल पर लिखा होता है – समाधानाधीन, बैठक जारी है, हेयरकट.
किसान की जमीन नीलाम होने लगे तो कहा जाता है कि बैंक का पैसा जनता का पैसा है, इसकी वसूली जरूरी है मगर जब बड़े कर्जों के मामलों में भारी कटौती होती है तो हवाला दिया जाता है कि आर्थिक व्यवस्था की मजबूती के लिए यह मजबूरी जरूरी है. देखा जाए तो यह आर्थिक मजबूरी भी अजीब चीज है. वह किसान के घर कभी नहीं पहुंचती, वह मजदूर की झोपड़ी तक आने से पहले रास्ता भूल जाती है और बेरोजगार के पास तो आने से ही कतराती है.
मगर जैसे ही बड़ उद्योगपतियों के हजारों करोड़ रुपए का मामला आता है, आर्थिक मजबूरी फाइलों पर बैठकर पूरे सिस्टम को समझाने लगती है कि भाई साहब, कर्ज माफी ही व्यावहारिक रास्ता है. इसी मजबूरी के चलते सरकारों ने पिछले कुछ वर्षों के देश के बड़े कर्जदारों के करीब आठ लाख करोड़ रुपए माफ कर दिए. आंकड़े गवाह हैं कि आम आदमी जिस बैंकिंग व्यवस्था को अपनी बचत का सबसे सुरक्षित ठिकाना मानता है उसी व्यवस्था में बड़े कर्जदारों के मामलों में होने वाले समझौतों ने भरोसे पर गहरी चोट पहुंचाई है.
घसीटाराम को भी अब यह लगने लगा है कि सरकार को अब कर्जदारों के लिए कानून या नियम बनाने की जहमत नहीं उठानी चाहिए. तहसील, बैंक, आरबीआई सबके सामने बस एक ही बोर्ड टांग देना चाहिए जिसमें ऊपर लिखा होगा - छोटे कर्जदार कृपया अपना नाम, जमीन और सम्मान बचाने के लिए समय पर किस्त जमा करें. इस बोर्ड में नीचे बड़े कर्जदारों के लिए छोटे अक्षरों में लिख देना चाहिए - ये हैं देश के वे महान आर्थिक योद्धा, जिनके कर्ज का वजन इतना ज्यादा था कि देश और बैंक की कमर झुकी जा रही है, इसलिए समाधान ही आखिरी सहारा है.
अगर यह पारदर्शी, जवाबदेह तरीका अपनाया जाएगा तो कम से कम आम आदमी को भ्रम तो नहीं रहेगा. उसे यह तो समझ आ जाएगा कि उसकी हैसियत किस कॉलम में दर्ज है. घसीटाम ने इस देश के तमाम गरीबों को यह सलाह दी है कि अब छोटे सपने देखना बंद कर दो क्योंकि छोटे सपने हमेशा जोखिम के साए में पलते हैं. पचास हजार रुपए का कर्ज लेकर बेटी की शादी करना जोखिम है, एक लाख रुपए का कर्ज लेकर खेती करना जोखिम है, दो लाख रुपए का कर्ज लेकर घर बनाना जोखिम है मगर हजारों करोड़ के कर्ज की दुनिया अलग है. वहां जोखिम नहीं. नोटिस की जगह बैठक होती है, कुर्की की जगह कमेटी बैठती है, नीलामी की जगह समाधान होता है.
इतना कुछ होने के बाद भी चौराहों पर बड़े-बड़े होर्डिंग और मंचों से एक देश-एक विधान, एक देश- एक संविधान जैसे जुमले उछालकर गरीबों को यह अहसास दिलाया जाता है कि कानून सबके लिए बराबर है. घसीटाराम इस बराबरी को देखकर अक्सर सोचता है कि शायद कानून की पास की नजर कुछ कमजोर हो गई है. उसे दूर बैठा हुआ गरीब, उसकी छोटी सी जमीन, टूटा हुआ मकान और बैंक की किस्त तो बहुत साफ नजर आती हैं मगर पास में ही बड़े आदमी की झोली में रखा हुआ हजारों करोड़ का कर्ज बहुत धुंधला नजर आता है.
घसीटाराम अब समझ चुका है कि इस देश में कर्ज की असली रकम खाते में नहीं लिखी होती, कर्जदार की हैसियत में लिखी होती है और आम आदमी की हैसियत उस आम से बड़ी नहीं है जिसे पेड़ पर हर कोई अपना बताता है मगर जब हाथ में आता है तो चूसकर फेंक दिया जाता है.