
चुनाव घसीटने की हद
हास-परिहास
राजस्थान में पंचायतीराज चुनावों को डेढ़-दो साल तक घसीटने के बाद सरकार को आखिरकार याद आया कि चुनाव भी कोई चीज होती है. वरना अब तक तो सरकार ‘वन स्टेट, वन इलेक्शन’ का ऐसा जाप कर रही थी, जैसे लोकतंत्र नहीं, कोई नया सरकारी मंत्र खोज लिया हो. खोजे भी क्यों नहीं क्योंकि नए-नए चेहरों के हाथ जब सत्ता की कुंजी लगी तो उन्हें अर्जुन की आंख की तरह केंद्र सरकार के वन स्टेट – वन इलेक्शन जैसे कुछ रटे-रटाए स्लोगन ही तो नजर आ रहे थे. फिर क्या था सरकारी सयानो ने इसमें एक नया स्लोगन ढूंढ़ा – वन स्टेट – वन इलेक्शन. डेढ़ साल तक पूरी सरकार तोते की तरह इसी स्लोगन को रटती रही. हौश वालों को यह भी खबर नहीं रही कि समय पर चुनाव भी कराने होते हैं. मामला सत्ता के गलियारों से निकलते हुए अदालत की दहलीज तक पहुंचा. अदालत ने फटकार लगाई तो सरकार की आंख खुली. वन स्टेट, वन इलेक्शन की रट कुछ धीमी हुई और चुनाव की तैयारी शुरू हुई. लेकिन चुनाव की फाइल आगे बढ़ी तो एक और ज्ञान प्राप्त हुआ कि अरे! ओबीसी आयोग नाम की भी कोई चिड़िया होती है और पंचायत चुनाव में आरक्षण देने के लिए उसकी रिपोर्ट भी चाहिए.
बस फिर क्या था. आनन-फानन में आयोग बना. आयोग भी शायद सरकार की ही ट्रेनिंग लेकर आया था. न पुराने आंकड़ों की ज्यादा चिंता, न नए सामाजिक समीकरणों की गहरी पड़ताल, न गांव की चौपाल पर जाकर यह देखने की जरूरत कि जमीन पर कौन कहां खड़ा है. रिपोर्ट आई और सरकार ने उसे ऐसे स्वीकार कर लिया, जैसे आयोग ने कोई वेदवाक्य सुना दिया हो.
सरकार ने आंख मूंदकर रिपोर्ट पर भरोसा किया और फटाफट आरक्षण भी लागू कर दिया. मगर लोकतंत्र की असली परीक्षा तो इसके बाद शुरू हुई. सियासी सयानो ने हिसाब-किताब देखा तो पता चला कि आरक्षण का हिसाब ही कुछ गड़बड़ है. जिसे पूरा समझकर लागू किया गया था, वह पूरा था ही नहीं. अब हालत यह है कि सरकार आयोग की तरफ देख रही है और आयोग सरकार की तरफ. दोनों के चेहरे पर वही भाव हैं जो स्कूल में मास्टरजी के सामने होमवर्क भूल जाने वाले बच्चे के चेहरे पर होते हैं.
सरकार कहती है - आयोग ने रिपोर्ट दी थी.
आयोग कहता है - सरकार ने रिपोर्ट पर फैसला किया था.
सरकार और आयोग एक-दूसरे से पूछ रहे हैं - गलती किसकी थी?
जनता पूछ रही है - चुनाव कौन कराएगा?
पंचायतीराज चुनावों का यह पूरा किस्सा देखकर लगता है कि राजस्थान में चुनाव कराने से ज्यादा कठिन काम चुनाव कराने का फैसला करना है. पहले चुनाव टलते रहे, फिर ‘वन स्टेट, वन इलेक्शन’ का सपना दिखा, कोर्ट ने जगाया तो आयोग याद आया, आयोग ने रिपोर्ट दी तो आरक्षण का हिसाब बिगड़ गया और अब गलती पकड़ में आई तो जिम्मेदारी का खेल शुरू हो गया. घसीटाराम का मानना है कि लोकतंत्र में सबसे ज्यादा जरूरी चीज चुनाव नहीं, समय पर चुनाव है. क्योंकि पांच साल के लिए चुनी गई पंचायत को अगर डेढ़-दो साल तक बिना चुनाव के घसीटा जाए तो फिर सवाल सिर्फ आरक्षण का नहीं रहता, लोकतांत्रिक जवाबदेही का भी हो जाता है. और अगर सरकार को चुनाव कराने से पहले हर बार कोई नया आयोग, नया आंकड़ा और नया बहाना चाहिए, तो फिर जनता को भी एक आयोग बना लेना चाहिए - ‘सरकार आखिर चुनाव कब कराएगी, इसकी जांच के लिए आयोग’. इस आयोग की रिपोर्ट आने में शायद अगली पंचायतीराज चुनाव की तारीख आ जाए. तब तक सरकार और आयोग आराम से एक-दूसरे के पीछे छिपते रहें.
जनता तो आखिर जनता है, वह सब देख रही है और घसीटाराम भी.