
बगावत ने बिगाड़ा गणित
बगावत रोकने के लिए राजनीतिक दलों की सीधे आरओ के सामने सिंबल जमा कराने की रणनीति कई जगह पड़ी भारी, आपसी खींचतान में उम्मीदवारों के चुनाव चिन्ह अटके.
राजस्थान के 309 नगरीय निकायों में चुनावी मुकाबले से पहले ही राजनीतिक दलों की रणनीतियां, टिकट वितरण और सिंबल प्रबंधन सवालों के घेरे में आ गए हैं. नामांकन पत्रों की जांच के दौरान भी कई प्रत्याशियों के पर्चे खारिज हुए हैं, जिससे चुनावी तस्वीर लगातार बदल रही है. सूबे में निकाय चुनाव का महासंग्राम शुरू होते ही कांग्रेस और भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनों की बगावत को रोकने की खड़ी हो गई है. टिकट वितरण से नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं के निर्दलीय मैदान में उतरने के बाद दोनों प्रमुख दलों ने इस बार अधिकृत उम्मीदवारों को अंतिम समय तक नियंत्रित रखने की रणनीति अपनाई. इसके तहत पार्टी प्रत्याशियों के चुनाव चिह्न सीधे रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष जमा कराने का फैसला किया गया मगर बगावत रोकने के लिए बनाई गई यही रणनीति अब कई जगह राजनीतिक दलों के लिए परेशानी का कारण बनती दिखाई दे रही है. प्रदेश के अलग-अलग शहरों से सिंबल जमा नहीं होने, अधिकृत प्रत्याशियों के नामांकन नहीं करने, नामांकन खारिज होने और टिकट वितरण को लेकर बगावत के मामले सामने आए हैं.
भीलवाड़ा में 17 उम्मीदवारों के सिंबल नहीं पहुंचे, कांग्रेस में घमासान
सबसे बड़ा मामला भीलवाड़ा नगर निगम चुनाव में सामने आया है, जहां कांग्रेस की सिंबल प्रबंधन व्यवस्था ही पार्टी के लिए बड़ा संकट बन गई. कांग्रेस ने नगर निगम के सभी 70 वार्डों के लिए प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया पूरी की थी. पार्टी ने ऑनलाइन आवेदन मंगवाकर पैनल तैयार किए और प्रदेश नेतृत्व ने जिला नेताओं से चर्चा के बाद उम्मीदवारों के नाम तय किए थे मगर नामांकन के अंतिम दिन पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने अधिकृत उम्मीदवारों के सिंबल समय पर रिटर्निंग ऑफिसर तक पहुंचाने की थी. निर्धारित समय दोपहर 3 बजे तक 70 में से केवल 53 उम्मीदवारों के सिंबल ही रिटर्निंग ऑफिसर के समक्ष जमा हो सके. बाकी 17 उम्मीदवारों के सिंबल समय पर जमा नहीं होने के कारण उन्हें कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी के रूप में मान्यता नहीं मिल सकी.
इस घटना ने कांग्रेस के भीतर ही बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है. प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सदस्य मनोज पालीवाल ने पूरे मामले के लिए प्रदेश नेतृत्व और स्थानीय नेताओं को जिम्मेदार ठहराते हुए गंभीर आरोप लगाए हैं. उनका कहना है कि प्रत्याशियों के चयन की पूरी प्रक्रिया होने के बावजूद अंतिम समय में सिंबल प्रबंधन में हुई चूक का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा और उसके संभावित पार्षद चुनावी मुकाबले से बाहर हो गए. पालीवाल ने मामले की शिकायत कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे तक पहुंचाने की बात कही है और पूरे घटनाक्रम की जांच की मांग की है. भीलवाड़ा की घटना ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि बगावत रोकने और अंतिम समय तक प्रत्याशियों पर नियंत्रण रखने के लिए अपनाई गई रणनीति कहीं पार्टी के लिए ही आत्मघाती तो साबित नहीं हो रही.
मथानिया नगरपालिका चुनाव में नामांकन के आखिरी दिन शुरू हुआ सियासी विवाद करीब 19 घंटे तक चला. पूर्व विधायक दिव्या मदेरणा के धरने और प्रशासन पर उठे गंभीर सवालों के बाद मंगलवार सुबह करीब 11 बजे जाकर मामला शांत हुआ. पुलिस और प्रशासन के आला अधिकारियों की मौजूदगी में सहमति बनने के बाद मदेरणा ने धरना समाप्त करने की घोषणा की. मदेरणा ने ओसियां विधायक भैराराम सियोल के रिटर्निंग ऑफिसर के कक्ष में प्रवेश करने और वार्ड 6 से भाजपा प्रत्याशी के नामांकन को लेकर तीखे सवाल उठाए थे. उन्होंने पूरे घटनाक्रम को लेकर प्रशासन की निष्पक्षता पर संदेह जताया और साफ कहा कि जब तक निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव की गारंटी नहीं मिलेगी, उनका विरोध जारी रहेगा. धरने के दौरान प्रशासनिक अधिकारियों के साथ कई दौर की बातचीत हुई. शुरुआत में एडीएम और एएसपी स्तर के अधिकारियों ने मदेरणा से बातचीत कर मामला सुलझाने का प्रयास किया, लेकिन वे इससे संतुष्ट नहीं हुईं. मदेरणा ने साफ तौर पर पुलिस उपायुक्त (DCP) समेत वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में अंतिम वार्ता की मांग रखी. इसके बाद मामला प्रशासन के लिए भी प्रतिष्ठा का सवाल बन गया और वरिष्ठ अधिकारियों को मौके पर आना पड़ा. आखिरकार आला अधिकारियों की मौजूदगी में हुई बातचीत के बाद सहमति बनी और मदेरणा ने करीब 19 घंटे बाद अपना धरना समाप्त कर दिया.
पाली में भी सिंबल को लेकर विवाद
पाली में भी कांग्रेस ने सिंबल को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं. पार्टी का दावा है कि उसने 65 सिंबल जमा करवाए थे, लेकिन बाद में दो सिंबल कम होने की जानकारी दी गई. कांग्रेस ने प्रशासन पर भाजपा नेताओं के दबाव में काम करने का आरोप लगाया है, जबकि भाजपा ने इन आरोपों को निराधार बताया है.
कहीं प्रत्याशी नहीं पहुंचे, कहीं पर्चे हुए खारिज :
सिर्फ सिंबल ही नहीं, कई जगह अधिकृत प्रत्याशियों के नामांकन और टिकट वितरण ने भी चुनावी समीकरण बदल दिए हैं. जयपुर नगर निगम के वार्ड संख्या 146 में भाजपा ने जिस महिला को प्रत्याशी घोषित किया था, उसने नामांकन ही दाखिल नहीं किया. वहीं वार्ड 111 से कांग्रेस प्रत्याशी का नामांकन जांच के दौरान खारिज हो गया.
सीकर में भी भाजपा के घोषित उम्मीदवारों द्वारा नामांकन नहीं भरने का मामला सामने आया है. यहां वार्ड 4 और 23 में पार्टी के अधिकृत प्रत्याशियों ने नामांकन दाखिल नहीं किया, जिसके बाद अन्य नामांकन करने वाले पार्टी नेताओं को अधिकृत प्रत्याशी बनाए जाने की स्थिति बनी.
बागियों ने बढ़ाई दोनों दलों की चिंता :
इस बीच टिकट वितरण ने दोनों दलों के भीतर बगावत की आग को भी हवा दी है. उदयपुर में कांग्रेस के 22 बागी सामने आए हैं, जिन्हें मनाने के लिए पार्टी नेतृत्व ने प्रयास शुरू किए हैं. अजमेर में भी कांग्रेस और भाजपा दोनों के सामने बड़ी संख्या में बागी उम्मीदवार चुनौती बने हुए हैं.
बड़ीसादड़ी में भाजपा के करीब 40 पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने अंदरूनी नाराजगी के चलते इस्तीफा दे दिया, जबकि हनुमानगढ़ के संगरिया में टिकट नहीं मिलने से नाराज कांग्रेस मंडल अध्यक्ष ने पद छोड़ दिया.
जयपुर में भी भाजपा कार्यकर्ताओं ने कथित पैराशूट उम्मीदवार को टिकट देने के विरोध में प्रदर्शन किया.
अब 3 सितंबर तक नाम वापसी का समय है और इसके बाद चुनावी तस्वीर पूरी तरह साफ होगी. 4 सितंबर को प्रत्याशियों को चुनाव चिह्न आवंटित किए जाएंगे. लेकिन उससे पहले यह साफ हो चुका है कि राजस्थान के निकाय चुनाव में विपक्ष से ज्यादा चुनौती कई नेताओं को अपने ही दल के भीतर से मिल रही है.
राजस्थान के निकाय चुनाव में इस बार असली मुकाबला केवल कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं है. टिकट से नाराज कार्यकर्ता, बागी उम्मीदवार, सिंबल को लेकर विवाद और पार्टी के भीतर की खींचतान ने चुनाव को बेहद दिलचस्प बना दिया है. भीलवाड़ा में 17 उम्मीदवारों के सिंबल समय पर जमा नहीं होने की घटना ने खास तौर पर राजनीतिक दलों की चुनावी तैयारियों और आंतरिक समन्वय पर बड़े सवाल खड़े किए हैं. आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों दल अपने बागियों और अंदरूनी विवादों को कितना संभाल पाते हैं.
