
कुराबड़ में भाजपा की हैट्रिक होगी या कांग्रेस की वापसी
उदयपुर की 20 पंचायत समितियों में आरक्षण से बदली सियासी बिसात, 8 पंचायत समितियों में एसटी ओपन, 7 में एसटी महिला, घासा में एसी व बड़गांव में अनारक्षित ओपन सीट
पंचायतीराज चुनाव से पहले उदयपुर की 20 पंचायत समितियों में प्रधान पदों के आरक्षण ने ग्रामीण राजनीति की पूरी बिसात बदल दी है. आरक्षण लॉटरी के बाद कहीं पुराने दावेदारों की राह बंद हुई है तो कहीं नए चेहरों के लिए सियासी दरवाजे खुल गए हैं. जिले की 20 पंचायत समितियों में 15 प्रधान पद अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हुए हैं. इनमें 8 सीटें एसटी ओपन और 7 सीटें एसटी महिला के लिए हैं.
घासा में प्रधान पद एससी ओपन और बड़गांव में अनारक्षित ओपन रखा गया है, जबकि भिंडर, वल्लभनगर और मावली में प्रधान पद अनारक्षित महिला के लिए आरक्षित हुए हैं. एसटी ओपन में कुराबड़, गिर्वा, कोटड़ा, सुलाव, गोगुंदा, सायरा, खेरवाड़ा और नयागांव पंचायत समितियां शामिल हैं. वहीं नाई, झाड़ोल, फलासिया, ओगणा, देवला, ऋषभदेव और कल्याणपुर पंचायत समितियों में एसटी महिला के लिए आरक्षण हुआ है.
आरक्षण की तस्वीर साफ होते ही संभावित दावेदारों ने जनसंपर्क तेज कर दिया है और गांवों की चौपाल से लेकर सोशल मीडिया तक सियासी हलचल बढ़ गई है. सबसे ज्यादा नजर उन पंचायत समितियों पर है, जहां आरक्षण ने दोनों प्रमुख दलों की रणनीति को नए सिरे से तय करने के लिए मजबूर कर दिया है. ओबीसी वर्ग के लिए एक भी प्रधान पद आरक्षित नहीं होने से इस वर्ग में असंतोष के स्वर भी सुनाई देने लगे हैं. अब असली परीक्षा भाजपा और कांग्रेस के लिए टिकट वितरण के बाद शुरू होगी, क्योंकि आरक्षण ने सिर्फ सीटों का गणित बदला है बल्कि दावेदारों की तस्वीर भी बदल दी है.
क्या भाजपा लगा पाएगी हैट्रिक
पंचायतीराज चुनाव की आहट के साथ कुराबड़ पंचायत समिति में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. 15 वार्डों के आरक्षण की तस्वीर साफ होते ही संभावित दावेदारों ने अपने-अपने समीकरण साधने शुरू कर दिए हैं. पिछले दो चुनावों में भाजपा बोर्ड बनाने में सफल रही है, ऐसे में इस बार पार्टी के सामने लगातार तीसरी जीत दर्ज कर अपनी बढ़त कायम रखने की चुनौती है.
प्रधान पद एसटी ओपन के लिए आरक्षित होने और वार्डों में अलग-अलग वर्गों के आरक्षण ने टिकट रणनीति को भी बदल दिया है.
पंचायत चुनाव में स्थानीय समीकरण अक्सर पार्टी के बड़े राजनीतिक नैरेटिव से अलग दिशा ले लेते हैं. हालांकि देहात भाजपा जिलाध्यक्ष पुष्कर तेली, वल्लभनगर विधायक उदय लाल डांगी जैसे नेताओं के नेतृत्व में भाजपा के भाजपा मंडल अध्यक्ष भरत मीणा, निवर्तमान जिला परिषद सदस्य मदन सिंह कृष्णावत, महामंत्री वालाराम, ख्याली लाल जैन, पूर्व प्रधान जोगेन्द्र पटेल, पूर्व महामंत्री गणपत रेबारी, केशर सिंह सिसोदिया, पूर्व प्रधान कृष्णा मीणा, पूर्व मंडल अध्यक्ष गंगाराम पटेल, पूर्व महामंत्री दर्जान सिंह, पूर्व पंचायत समिति सदस्य भैरु सिंह सिसोदिया, पूर्व पंचायत समिति सदस्य भैरु लाल पटेल, बोरी के पूर्व सरपंच प्रेमचंद पटेल, बेमला के पूर्व सरपंच पुष्कर वैष्णव, पूर्व मंडल अध्यक्ष कालुलाल लोहार, नवनीत औदीच्य, ईश्वर गुर्जर व वीपी सिंह जैसे कई कार्यकर्ता भाजपा का बोर्ड बनाने के लिए जी-जान से जुटे हैं.
कांग्रेस के सामने सिर्फ चुनाव नहीं, वापसी की परीक्षा :
कांग्रेस के लिए कुराबड़ का चुनाव अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का अवसर है. पिछले दो चुनावों में भाजपा के बोर्ड बनने के बाद कांग्रेस के सामने अब ऐसी रणनीति बनाने की चुनौती होगी, जिससे पार्टी स्थानीय स्तर पर मुकाबले को दो ध्रुवीय बनाए रख सके. कांग्रेस के लिए आरक्षण ने नए चेहरों के लिए रास्ते खोले हैं.
विशेषकर महिला आरक्षण वाले पांच सामान्य वार्ड और अनुसूचित जनजाति महिला के दो वार्ड ऐसे क्षेत्र हैं, जहां नए राजनीतिक चेहरे सामने आ सकते हैं. कांग्रेस की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि वह स्थानीय दावेदारों के बीच संतुलन कैसे बनाती है और टिकट मिलने के बाद संगठन किस हद तक एकजुट होकर मैदान में उतरता है.
यहां पूर्व विधायक प्रीति गजेंद्र सिंह शक्तावत व देहात कांग्रेस कमेटी के जिलाध्यक्ष रघुवीर सिंह मीणा के नेतृत्व कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष खेमराज मीणा, पूर्व नेता प्रतिपक्ष नवल सिंह चुंडावत, कुबेर सिंह चौहान, कांग्रेस मंडल अध्यक्ष विक्रम सिंह, कांग्रेस मंडल अध्यक्ष मावाराम पटेल, नारायण सिंह, दिलीप जारोली, पूर्व पंचायत समिति सदस्य कालू लाल मेघवाल, अंतोश चौधरी, यशवंत सिंह सिसोदिया, दिनेश चौधरी फिला, किशन सिंह चुंडावत, भैरुलाल मीणा, सुखलाल पटेल, प्रकाश मीणा, भरत मीणा, नरेंद्र जैन, बाबू लाल ओड, रघुवीर सिंह चौहान, अशोक नागदा, सुरेन्द्र मेघवाल सुलावास, किशोर सालवी कुराबड़, करण किरण चौधरी व विजय सालवी बंबोरा जैसे अनेक कांग्रेस कार्यकर्ता कांग्रेस का बोर्ड बनाने की कवायद में जुटे हैं.
आरक्षण ने बदल दिया वार्डों का गणित :
कुराबड़ में प्रधान की सीट एसटी ओपन आरक्षित है। 15 वार्डों का आरक्षण इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक राजनीतिक कारक बन गया है. वार्ड 3 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. वार्ड 4, 7 और 11 अनुसूचित जनजाति के लिए खुले हैं, जबकि वार्ड 1 और 9 अनुसूचित जनजाति महिला के लिए आरक्षित हैं. वार्ड 8 अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित है. वहीं सामान्य वर्ग में वार्ड 2, 6 और 12 खुले हैं, जबकि वार्ड 5, 10, 13, 14 और 15 सामान्य महिला के लिए आरक्षित हैं.
आरक्षण लॉटरी के बाद कुछ पुराने दावेदारों के लिए राजनीतिक रास्ता बंद हुआ है तो कुछ नए चेहरों के लिए पहली बार अवसर बना है. यही कारण है कि अभी उम्मीदवार घोषित होने से पहले ही राजनीतिक हलचल दिखाई देने लगी है. पंचायत समिति के 15 वार्डों में सामान्य महिला के लिए पांच सीटों का आरक्षण और दो सीटों का अनुसूचित जनजाति महिला के लिए आरक्षण चुनाव में महिला प्रतिनिधित्व को महत्वपूर्ण बनाएगा. इन सीटों पर मुकाबला केवल महिला प्रत्याशियों के बीच नहीं होगा, बल्कि उनके पीछे सक्रिय राजनीतिक परिवारों और स्थानीय संगठनों की भूमिका भी चर्चा का विषय बनेगी.
कई जगह महिला आरक्षण स्थानीय राजनीति में ऐसे चेहरों को सामने आने का अवसर देता है, जो इससे पहले प्रत्यक्ष चुनावी मैदान में नहीं रहे। इसलिए इन सात वार्डों पर दोनों प्रमुख दलों की नजर रहना स्वाभाविक है.हालिया शहरी निकाय चुनावों के परिणामों के बाद ग्रामीण क्षेत्रों की राजनीति में भी नए समीकरणों की चर्चा है. कुराबड़ भी इससे अछूता नहीं है. हालांकि पंचायत चुनाव का अपना अलग स्थानीय गणित होता है, लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रम ने कार्यकर्ताओं और नेताओं की सक्रियता बढ़ा दी है.
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि शहरी निकाय चुनावों के बाद बने राजनीतिक समीकरण पंचायत समिति के चुनाव तक किस रूप में पहुंचते हैं. पुराने स्थानीय समीकरण कायम रहते हैं या नए राजनीतिक गठजोड़ आकार लेते हैं. फिलहाल कुराबड़ में चुनाव की दस्तक अब केवल चौपालों तक सीमित नहीं है. संभावित दावेदार सोशल मीडिया के जरिए अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं. यह बदलाव पंचायत चुनाव की बदलती राजनीति को भी दिखाता है. पहले जहां दावेदारी और प्रचार का बड़ा हिस्सा गांव की बैठक, चौपाल और व्यक्तिगत संपर्क पर निर्भर रहता था, वहीं अब सोशल मीडिया भी शुरुआती राजनीतिक माहौल बनाने का माध्यम बन चुका है. अभी चुनावी बिसात बिछी है, मोहरे तय होना बाकी हैं. आरक्षण ने संभावित दावेदारों का दायरा जरूर स्पष्ट कर दिया है, लेकिन भाजपा और कांग्रेस के टिकट वितरण के बाद ही मुकाबले की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी.
