
अमर्यादित व्यवहार की विभीषिका कैसे रुकेगी?
सीजेपी के आंदोलन से उभरे सवालों का जवाब खोजता नजरिया
किसी भी रोग के सटीक और स्थायी उपचार की पहली शर्त उसके मूल कारणों की पहचान करना है. जब तक समस्या की जड़ तक नहीं पहुंचा जाए, तब तक उसका वास्तविक समाधान संभव नहीं होता. हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश की युवा पीढ़ी का आक्रोश, आंदोलन और मर्यादा की सीमाओं को लांघती भाषा चर्चा का विषय बने. भले ही यह घटनाक्रम फिलहाल शांत होता दिखाई दे रहा हो, मगर यह अपने पीछे अनेक गंभीर और अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गया है.
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की एक मौखिक टिप्पणी से प्रेरित होकर प्रारंभ हुए इस आंदोलन ने जिस तीव्रता और आक्रामकता का रूप धारण किया, वह केवल एक राजनीतिक दल या किसी एक संगठन की देन नहीं था. इसके पीछे वर्षों से जमा हो रहा असंतोष भी एक प्रमुख कारण था. रोजगार की तलाश में भटक रही युवा पीढ़ी और प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से अपना भविष्य संवारने का सपना देखने वाले लाखों अभ्यर्थी पहले ही गहरे मानसिक दबाव में थे. लगातार सामने आते पेपर लीक के मामलों ने उनकी उम्मीदों को बार-बार तोड़ा और उन्हें हताशा के गर्त में धकेल दिया. ऐसे में हालिया यह घटनाक्रम एक ऐसी चिनगारी साबित हुआ जिसके असंतोष की आग तो भीतर ही भीतर काफी समय से सुलग रही थी.
इन परिस्थितियों के बावजूद देश के अभिभावकों, शिक्षकों, समाजशास्त्रियों, चिंतकों और वरिष्ठ पीढ़ी के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा होता है. जंतर-मंतर पर आंदोलन कर रहे कुछ युवक-युवतियों ने जिन सम्मानित एवं उत्तरदायी पदों पर आसीन व्यक्तियों के लिए जिस प्रकार की अमर्यादित भाषा और व्यवहार का प्रदर्शन किया, क्या वह हमारी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों के अनुरूप है? क्या किसी भी असहमति को व्यक्त करने का यही स्वीकार्य तरीका हो सकता है? यदि नहीं, तो फिर वे कौन-सी परिस्थितियां थीं, जिन्होंने हमारे युवाओं को इस सीमा तक पहुंचा दिया?
यह सही है कि इस आचरण को सार्वजनिक रूप से क्षमा कर दिया गया जिसे एक सकारात्मक और स्वागतयोग्य पहल कहा जा सकता है किंतु केवल क्षमा कर देना भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है. क्या दोषियों को कठोर कानूनी दंड देकर इस समस्या का समाधान निकाला जा सकता है? संभवतः नहीं. ऐसा करना आग में घी डालने जैसा होगा. यदि स्थायी समाधान खोजना है तो हमें इस आंदोलन से कहीं अधिक पीछे लौटकर उन सामाजिक परिस्थितियों की पड़ताल करनी होगी, जहां इस प्रवृत्ति के बीज पड़े.
देखा जाए तो आज की जेन-जी (14 से 29 वर्ष) जब अपने व्यक्तित्व और संस्कारों की नींव रख रही थी, तब जेन-एक्स (46 से 61 वर्ष) अर्थात उनके माता-पिता महंगाई, रोजगार और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच निरंतर संघर्ष कर रहे थे. बच्चों का बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने की दौड़ में वे स्वयं नौकरी, व्यापार और व्यवसाय में इतने व्यस्त हो गए कि कई बार उन्हें अपने बच्चों के साथ पर्याप्त समय बिताने, उनका मार्गदर्शन करने और संस्कार देने का अवसर ही नहीं मिला. कहीं-कहीं अपनी आकांक्षाओं, सामाजिक प्रतिस्पर्धा और जीवनशैली की दौड़ ने भी इस दूरी को बढ़ाया.
यदि संस्कारों के निर्माण की इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में सरकार, समाज और स्वयं अभिभावक इतने लापरवाह, अनभिज्ञ या निश्चिंत रहे हैं, तो उसके परिणाम भी उन्हें ही भुगतने होंगे. यही कारण है कि आज अमर्यादित व्यवहार केवल आंदोलनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पारिवारिक रिश्तों, सामाजिक संवाद और दैनिक व्यवहार में भी स्पष्ट दिखाई देता है. बढ़ते वैवाहिक विवाद, पारिवारिक विघटन और तलाक की घटनाए भी कहीं न कहीं इसी बदलती सामाजिक मानसिकता का प्रतिबिंब हैं. ऐसे में अब जेन-अल्फा (10 से 13 वर्ष) के संस्कारों और व्यवहार की दिशा को लेकर चिंता ओर भी ज्यादा स्वाभाविक है. यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो इसके परिणाम और भी भयावह हो सकते हैं.
बचपन में मिले संस्कार व्यक्ति के व्यक्तित्व की आधारशिला होते हैं. बाद के जीवन में उन्हें पूरी तरह बदल पाना आसान नहीं होता. स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब यही युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनिश्चितता और पेपर लीक जैसी निराशाजनक परिस्थितियों से जूझते हैं. आज की जेन-जी का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो न शिक्षा प्राप्त कर रहा है, न किसी कौशल प्रशिक्षण से जुड़ा है और न ही किसी सम्मानजनक रोजगार में है. इतनी बड़ी संख्या में खाली, दिशाहीन और निराश युवा ऊर्जा यदि सकारात्मक दिशा नहीं पाएगी तो उसका विस्फोट किसी न किसी रूप में अवश्य होगा. इस स्थिति के लिए युवाओं को पूरी तरह दोषी ठहराना उचित नहीं होगा. इसकी जिम्मेदारी सरकार, व्यवस्था और समाज—तीनों की है. क्या हम यह जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैंॽ
हमारी शिक्षा व्यवस्था भी इस असंतुलन की समान रूप से उत्तरदायी है. जो युवा कौशल आधारित शिक्षा प्राप्त कर आत्मनिर्भर बन सकते थे, उन्हें अक्सर केवल डिग्रीधारी बेरोजगार बनाकर छोड़ दिया जाता है. आज एक ओर कुशल इलेक्ट्रिशियन, कारपेंटर, प्लंबर, ड्राइवर, पेंटर और मैकेनिक जैसे तकनीकी कार्यों के लिए लोग नहीं मिलते वहीं दूसरी ओर लाखों शिक्षित बेरोजगार रोजगार की प्रतीक्षा में खड़े हैं. यह हमारी शिक्षा नीति और शासन-व्यवस्था की गंभीर विफलता नहीं तो और क्या है? ऐसी उद्देश्यहीन और निराश भीड़ यदि जंतर-मंतर जैसे आंदोलनों का हिस्सा बनती है तो उसमें आश्चर्य कैसा?
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं की लंबे समय तक उपेक्षा नहीं की जा सकती. रोजगार उनमें सबसे महत्वपूर्ण है, मगर उसके साथ-साथ सही सोच, संतुलित व्यवहार और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास भी उतना ही आवश्यक है. यदि इन दोनों पक्षों की अनदेखी की जाएगी तो समाज दिशाहीन, तनावग्रस्त और अंततः विध्वंसक प्रवृत्तियों की ओर ही बढ़ेगा.
समय की मांग है कि सरकार रोजगार सृजन के साथ-साथ मूल्यपरक शिक्षा, संस्कार और कौशल विकास को भी समान प्राथमिकता दे. जब युवाओं का पेट भरा होगा, मन शांत होगा और उनका मस्तिष्क किसी उद्देश्यपूर्ण कार्य में संलग्न होगा तभी समाज में शांति, सामंजस्य, समरसता और सुशासन की वास्तविक स्थापना संभव होगी. तभी हम उस आदर्श सामाजिक व्यवस्था की कल्पना कर सकेंगे जिसे हम रामराज्य के नाम से जानते हैं. क्या हम रामराज्य की इस कल्पना को अमलीजामा पहनाने के लिए तैयार हैंॽ
- लेखक कानूनी मामलों के विशेषज्ञ और राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश हैं.