
क्या दुनिया ‘निजी सामंतवाद’ के नए युग में प्रवेश कर रही है?
सरकारें अपनी जिम्मेदारियों से क्यों हट रही हैं?
बीसवीं सदी की सबसे बड़ी आर्थिक पहचान यह थी कि सरकारें केवल शासन नहीं करती थी बल्कि राष्ट्र की सबसे बड़ी वेल्थ क्रिएटर (संपत्ति सर्जक) भी होती थी. बड़े उद्योग, सार्वजनिक उपक्रम, इस्पात संयंत्र, बैंक, दूरसंचार नेटवर्क, बिजली परियोजनाएं, वैज्ञानिक संस्थान और राष्ट्रीय अवसंरचना, इन सबका निर्माण सरकारें करती थी. रोजगार पैदा करने से लेकर विज्ञान, अनुसंधान में निवेश और उस संपत्ति के सामाजिक पुनर्वितरण का जिम्मा भी सरकारों का ही था. मगर इक्कीसवीं सदी में यह आर्थिक दर्शन बदल चुका है. आज दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक परिवर्तन सरकार और निजी पूंजी के बीच बदलता हुआ शक्ति-संतुलन है. सरकारें धीरे-धीरे धन की सृजनकर्ता से धन की पुनर्वितरक बनती दिखाई दे रही हैं, वहीं पूंजी निर्माण, तकनीकी नवाचार, रोजगार और भविष्य की अर्थव्यवस्था का नेतृत्व निजी क्षेत्र के हाथों में केंद्रित होता जा रहा है.
अमेरिका को देखिए. दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और तकनीकी शक्ति होने के बावजूद आज वहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), क्लाउड कंप्यूटिंग, उन्नत सेमीकंडक्टर, डिजिटल प्लेटफॉर्म और वैश्विक डेटा अर्थव्यवस्था का नेतृत्व सरकार नहीं बल्कि निजी कंपनियां कर रही हैं. इसके कारण आज एआई की वैश्विक दौड़ देशों के बीच कम और कुछ निजी तकनीकी कंपनियों के बीच अधिक दिखाई देती है. इससे पहले कंप्यूटर और इंटरनेट के विकास में भी पिछले चार दशकों के दौरान माइक्रोसॉफ्ट से लेकर गूगल तक निजी कंपनियों की निर्णायक भूमिका रही है. क्या यह कहना गलत होगा कि अमेरिका ने प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निजी सामंतवाद को लंबे समय तक प्रतिष्ठित किया और उसके बाद यह चलन दूसरे देशों तक भी पहुंचा?
इन सब से भारत भी अछूता नहीं रहा. 2जी से लेकर 5जी तक की पूरी दूरसंचार क्रांति में निजी क्षेत्र ने निर्णायक भूमिका निभाई. आज करोड़ों भारतीय जिस डिजिटल नेटवर्क का उपयोग करते हैं, उसके विस्तार में मुख्यतः निजी निवेश की बड़ी भूमिका है. यही स्थिति नवीकरणीय ऊर्जा की है जहां बड़े निवेश निजी कंपनियां कर रही हैं. हवाई अड्डे, बंदरगाह, लॉजिस्टिक्स, डेटा सेंटर, औद्योगिक कॉरिडोर और अन्य बड़े अवसंरचनात्मक क्षेत्रों में भी निजी पूंजी निर्णायक भूमिका निभा रही है.
यह संयोग नहीं है कि जिन क्षेत्रों से आने वाले दशकों में सबसे अधिक आर्थिक मूल्य और लाभ उत्पन्न होने की संभावना है, उन्हीं क्षेत्रों में निजी क्षेत्र सबसे अधिक सक्रिय है. इसके अलावा आज बीएसई सेंसेक्स की 30 कंपनियों में सार्वजनिक क्षेत्र की सिर्फ दो कंपनियां - एसबीआई और एनटीपीसी ही शामिल हैं. निफ्टी-50 में भी सार्वजनिक क्षेत्र की उपस्थिति सीमित संख्या में कंपनियों तक रह गई है. यह केवल शेयर बाजार का आंकड़ा नहीं है. इसका अर्थ यह है कि भारत की सूचीबद्ध अर्थव्यवस्था का अधिकांश बाजार मूल्य, निवेश और भविष्य का पूंजी निर्माण निजी क्षेत्र के हाथों में है.
यदि कोई सामान्य भारतीय निवेशक देश की शीर्ष कंपनियों में निवेश करता है तो उसका अधिकांश निवेश निजी कंपनियों में जाने की संभावना है. अर्थात भारत की भविष्य की संपत्ति अब मुख्यतः निजी पूंजी बना रही है. यह बदलाव केवल शेयर बाजार तक सीमित नहीं है.
चीन इस बहस में एक अलग मॉडल प्रस्तुत करता है. उसने भी अलीबाबा, टेनसेंट और अन्य निजी कंपनियों को वैश्विक स्तर तक बढ़ने दिया, मगर जब सरकार को लगा कि निजी कॉरपोरेट शक्ति अत्यधिक प्रभावशाली हो रही है तब उसने कड़े नियामकीय हस्तक्षेप किए. अलीबाबा पर कार्रवाई और उसके संस्थापक जैक मा का लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन से लगभग गायब रहना इस बात का संकेत था कि चीन में अंतिम शक्ति का केंद्र राज्य ही है.
यहीं से लोकतंत्र की बदलती प्राथमिकताएं भी दिखाई देती हैं. सरकारों का ध्यान लगातार सामाजिक पुनर्वितरण की ओर बढ़ रहा है. प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, मुफ्त राशन, महिला वित्तीय सहायता, छात्रवृत्तियां, स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और अन्य कल्याणकारी योजनाएं लोकतांत्रिक राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं. इन योजनाओं की आवश्यकता से कोई इंकार नहीं कर सकता. कमजोर वर्गों की सुरक्षा किसी भी लोकतांत्रिक राज्य की जिम्मेदारी है. मगर बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसी योजनाएं धीरे-धीरे लोकप्रिय सरकार बनने का एक मुखौटा भी बनती जा रही हैं?
इसी संदर्भ में आर्थिक दृष्टि से एक दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या राज्य विकास के लिए आधारभूत संरचना के निर्माण की जिम्मेदारी से पीछे हट रहा है? वित्तीय वर्ष 2026-27 में राज्यों का संयुक्त पूंजीगत व्यय लगभग 10.45 लाख करोड़ रुपये निर्धारित किया गया, किंतु शुरुआती अवधि में उसका करीब 10 प्रतिशत ही उपयोग हो पाया. दूसरी ओर, पुनर्वितरण आधारित योजनाओं का दायरा लगातार बढ़ रहा है. यह किसी योजना की आलोचना नहीं बल्कि प्राथमिकताओं का प्रश्न है. यदि पूंजी निर्माण की गति अपेक्षाकृत धीमी रहे और विकास का अधिकांश निवेश निजी क्षेत्र करता रहे तो धीरे-धीरे सरकार की भूमिका विकासकर्ता से पुनर्वितरक की ओर स्थानांतरित होती दिखाई दे सकती है. इस मॉडल का एक प्रभाव रोजगार पर भी पड़ता है. एक समय सार्वजनिक क्षेत्र रोजगार का प्रमुख स्रोत था. आज रोजगार का भविष्य तेजी से निजी निवेश पर निर्भर होता जा रहा है. इसका अर्थ है कि रोजगार सृजन की गति भी बाजार और कॉरपोरेट निवेश के निर्णयों से अधिक प्रभावित होगी. आर्थिक वृद्धि और रोजगार के बीच संतुलन बनाए रखना इसीलिए और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है.
एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न अनुसंधान और नवाचार का है. भारत आज अनुसंधान एवं विकास (आर एंड डी) पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 0.84 प्रतिशत व्यय करता है, जबकि चीन लगभग 3 प्रतिशत के आसपास निवेश करता है. एआई, सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, जैव प्रौद्योगिकी और उन्नत विनिर्माण की अगली वैश्विक दौड़ में यही निवेश किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति तय करेगा. यदि सरकारें दीर्घकालीन वैज्ञानिक क्षमता निर्माण में अपेक्षित निवेश नहीं करेंगी और अत्यधिक भरोसा निजी क्षेत्र पर रहेगा तो भविष्य की तकनीकी प्रतिस्पर्धा में भारत के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हैं. इस बहस का एक पक्ष महंगाई और ऊर्जा के क्षेत्र से भी जुड़ा है. ऊर्जा क्षेत्र में निजी भागीदारी और बाजार संरचना के संबंधों को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए. पश्चिम एशिया संकट से पहले लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में अपेक्षाकृत नरमी रही, फिर भी उपभोक्ताओं को उसका पूरा लाभ हमेशा समान रूप से नहीं मिला. इसके पीछे कर व्यवस्था, विनियमन, वैश्विक बाजार और अन्य अनेक कारण हो सकते हैं. यह प्रश्न विचारणीय अवश्य है कि जिन क्षेत्रों में कुछ बड़े निजी खिलाड़ी प्रमुख भूमिका निभाते हैं, वहां प्रतिस्पर्धा, मूल्य निर्धारण और उपभोक्ता हितों के बीच संतुलन कैसे सुनिश्चित किया जाए? यही कारण है कि मजबूत नियामकीय संस्थाएं किसी भी आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए उतनी ही आवश्यक हैं, जितना मजबूत निजी क्षेत्र.
यहां प्रश्न निजी क्षेत्र के अत्यंत मजबूत हो जाने का नहीं है. निजी क्षेत्र आधुनिक अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी निवेशक, नवाचारकर्ता और जोखिम उठाने वाली शक्तियों में से एक है. प्रश्न यह है कि क्या सरकारें अपनी विकासात्मक भूमिका का संतुलन खो रही हैं?
अब समय नहीं है कि सरकार निजी उद्योग की प्रतिस्पर्धी बने, मगर उसे उन क्षेत्रों का नेतृत्व कभी नहीं छोड़ना चाहिए जहां बाजार स्वाभाविक रूप से पर्याप्त निवेश नहीं करता. भारत को इस बात को हमेशा ध्यान में रखना होगा कि उसकी बहुत बड़ी आबादी अभी भी मूलभूत सुविधाओं से दूर है. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, विशेषकर छोटे शहरों और गांवों तक समान स्तर पर पहुंचाना, सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए. सुलभ और उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाएं केवल सामाजिक न्याय का विषय नहीं हैं, बल्कि आर्थिक उत्पादकता की नींव भी हैं. यही वह निवेश है जो जीडीपी की दौड़ में आगे बढ़ने की संतुष्टि को वास्तविक आत्मविश्वास और आत्मसम्मान में बदल सकता है.
जल्द ही आने वाली पीढ़ी यह समझने की बजाय यह जानना चाहेगी कि अर्थव्यवस्था में धन कौन बना रहा है और क्या उसने भविष्य की दिशा तय करने में कुछ किया? यह प्रश्न अभी तक इसलिए नहीं पूछा गया क्योंकि बीसवीं सदी का आर्थिक सूत्र था — सरकार धन बनाती थी और सरकार ही उसका वितरण करती थी. अब उभरता हुआ सूत्र यह है — निजी क्षेत्र धन बना रहा है और सरकार उसका पुनर्वितरण कर रही है, मगर अपनी लोकप्रियता बनाए रखने के लिए.
अगर इस पर गंभीरता से चिंतन नहीं किया गया तो आने वाले दशकों में लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और राष्ट्र-राज्य की भूमिका — तीनों को नए सिरे से परिभाषित करना पड़ेगा.
- लेखक आर्थिक मामलों के जानकार और जाने-माने शिक्षाविद् हैं.