
पहले मुकदमों और आपत्तियों की भरमार अब बिना विरोध परिसीमन : राठौड़
राजस्थान में नगरीय निकाय व पंचायतीराज संस्थाओं के परिसीमन के लिए भाजपा की ओर से बनाई गई समिति के संयोजक राजेंद्र राठौड़ से खास बातचीत
राजस्थान में पंचायतीराज संस्थाओं और नगरीय निकायों के चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो गई है. सूबे में परिसीमन के बाद पंचायतीराज संस्थाओं और नगरीय निकायों का नक्शा पूरी तरह बदल चुका है. पहली बार ऐसा हुआ है कि प्रदेश में 3209 ग्राम पंचायतें, 162 पंचायत समितियां और 8 नई जिला परिषदें बनी हैं. अगर वार्डों की बात की जाए तो 45 हजार नए वार्ड बने हैं. इस प्रक्रिया में राज्य सरकार की तो बड़ी भूमिका रही ही है साथ ही भाजपा की ओर से पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ के संयोजन में गठित कमेटी का भी इसमें बड़ा योगदान माना जा रहा है. इस समिति ने प्रदेशभर में पंचायत स्तर तक समन्वय स्थापित कर ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों, जिला परिषदों और नगरीय निकायों के पुनर्गठन से संबंधित सुझाव तैयार किए और उन्हें राज्य सरकार की ओर से गठित उप समिति को सुपुर्द किया. पंचायत स्वर ने परिसीमन, पुनर्गठन व इसके राजनीतिक व प्रशासनिक पहलूओं पर समिति के संयोजक राजेंद्र राठौड़ से विस्तृत बातचीत की है. पेश है इस बातचीत के प्रमुख अंश :
पंचायतीराज संस्थाओं और नगरीय निकायों में परिसीमन क्यों जरूरी है?
समय के साथ जनसंख्या बढ़ती है, नए गांव और बस्तियां विकसित होती हैं तथा प्रशासनिक जरूरतें भी बदलती हैं. ऐसे में पुरानी सीमाओं के आधार पर बेहतर प्रशासन और समान प्रतिनिधित्व संभव नहीं होता. जनसंख्या, भौगोलिक स्थिति और प्रशासनिक सुविधा को ध्यान में रखते हुए पंचायतों और नगरीय निकायों का पुनर्गठन जरूरी था. जहां जनसंख्या और क्षेत्रफल प्रशासनिक दृष्टि से कम और संतुलित होगा, वहां विकास योजनाओं का क्रियान्वयन उतना ही बेहतर होगा.
परिसीमन के प्रमुख आधार क्या थे?
परिसीमन केवल कागजों पर सीमाएं खींचने का काम नहीं है. इसमें जनसंख्या, भौगोलिक स्थिति, गांवों और बस्तियों की आपसी दूरी तथा प्रशासनिक सुविधा जैसे कई पहलुओं को देखा गया. हमारा प्रयास रहा कि प्रतिनिधित्व में अधिकतम समानता आए और विभिन्न पंचायतों या वार्डों के बीच मतदाताओं की संख्या का संतुलन बना रहे.
वार्डों की सीमाओं को लेकर शिकायतें आती रही हैं. आपने इसे कैसे दूर किया?
पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में परिसीमन का आधार विकास और लोगों की सुविधा नहीं बल्कि चुनाव जीतने की प्रक्रिया का हिस्सा था. उस वक्त किसी वार्ड में 100 मतदाता थे तो किसी वार्ड में 3000 से ज्यादा मतदाता. इससे प्रतिनिधित्व में असमानता पैदा होती थी. हमने इस व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाने का प्रयास किया है ताकि वार्डों में जनसंख्या का अनुपात यथासंभव एकरूप हो सके.
क्या वार्डों में एकरूपता आ पाई है?
हां, हमने मरूस्थली क्षेत्र को छोड़कर प्रदेश में कहीं भी प्लस-माइनस 10 फीसदी से ज्यादा अंतर नहीं किया है. मरूस्थली क्षेत्र में जनंसख्या का घनत्व कम है और वह छितरी हुई जिसके कारण वहां प्लस-माइनस 15 फीसदी विचलन का फार्मूला अपनाया गया. यही वजह रही कि राजस्थान में 3 हजार से ज्यादा नई ग्राम पंचायतें और 45 हजार नए वार्डों का गठन हुआ है.
सरकार ने परिसीमन के लिए मंत्रिमंडलीय उप समिति का गठन किया था, उसकी क्या भूमिका रही?
राजस्थान पंचायतीराज अधिनियम 1994 की धारा 101 के तहत राज्य सरकार को पंचायतीराज संस्थाओं की सीमाओं में परिवर्तन और बदलाव का अधिकार प्राप्त है. सरकार ने इस प्रक्रिया को अपनाने के लिए पंचायतीराज मंत्री मदन दिलावर की अध्यक्षता में चार मंत्रियों की मंत्रिमंडलीय उप समिति का गठन किया था. इस समिति ने परिसीमन में हमारी सिफारिशों को प्रमुख आधार बनाया है.
आपकी समिति और सरकारी उप समिति का काम कैसे अलग था?
हमने प्रदेश के जिलों में स्थानीय स्तर तक समन्वय स्थापित किया और ग्राम पंचायत स्तर तक स्थितियों को समझने का प्रयास किया. इसके बाद पुनर्गठन से संबंधित सुझाव और रिपोर्ट मंत्रिमंडलीय उप समिति के समक्ष रखी गई.
इस पूरी प्रक्रिया में प्रशासनिक अधिकारियों की क्या भूमिका रही?
परिसीमन और पुनर्गठन की अंतिम प्रक्रिया पूरी तरह कानूनी और प्रशासनिक प्रावधानों के तहत होती है. स्थानीय स्तर से सुझाव लिए जाते हैं, जिला प्रशासन प्रस्ताव तैयार करता है और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आपत्तियां एवं सुझाव भी आमंत्रित किए जाते हैं. हमारी समिति का उद्देश्य जमीनी स्तर की समस्याओं और सुझावों को सरकार तक पहुंचाना था.
वन स्टेट वन इलेक्शन से परिसीमन का क्या संबंध है?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वन नेशन वन इलेक्शन की सोच के अनुरूप मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने राजस्थान में वन स्टेट वन इलेक्शन की रणनीति अपनाई थी. पहले पंचायतीराज और नगरीय निकायों के चुनाव अलग-अलग समय पर होने से करीब डेढ़ से दो साल का वक्त चुनावी प्रक्रिया में चला जाता था. हमने परिसीमन और वन स्टेट वन इलेक्शन की प्रक्रिया के माध्यम से चुनावी कार्यक्रम को अधिक व्यवस्थित किया है. इसमें 15 माह का समय जरुर लगा है मगर राजस्थान में अब पंचायतीराज व निकाया चुनावों में ज्यादा वक्त खराब नहीं होगा.
क्या परिसीमन के कारण चुनाव में देरी हुई?
पुनर्गठन और परिसीमन एक व्यापक प्रक्रिया है और इसे जल्दबाजी में नहीं किया जा सकता. पूरे प्रदेश की पंचायतों और निकायों की सीमाओं, जनसंख्या और प्रशासनिक जरूरतों का अध्ययन करना जरूरी था. इसमें कुछ समय लगा, मगर हमारा मानना है कि एक बार व्यवस्थित ढांचा तैयार होने के बाद भविष्य में चुनावी प्रक्रिया को बेहतर ढंग से संचालित किया जा सकेगा.
विपक्ष आरोप लगाता है कि परिसीमन अक्सर राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है?
पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों के समय में शायद यही परिपाटी रही थी, इसके चलते ही वो ऐसे मनगढंत आरोप लगा रहे हैं. हमारा प्रयास राजनीतिक लाभ के बजाय पूरे प्रदेश में एकरूपता और प्रशासनिक सुविधा सुनिश्चित करना रहा है. परिसीमन का उद्देश्य किसी दल विशेष को फायदा पहुंचाना नहीं, बल्कि जनसंख्या और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना होना चाहिए. हमने जमीनी स्तर से प्राप्त सुझावों के आधार पर काम किया है.
आपकी और पूर्ववर्ती सरकारों की परिसीमन प्रक्रिया में क्या अंतर है?
पिछले परिसीमन के दौरान प्रदेश के कई हिस्सों में विरोध हुआ और 22 मामले अदालतों तक पहुंचे. इस बार हमने स्थानीय स्तर पर व्यापक समन्वय और संवाद स्थापित करने का प्रयास किया. हमें खुशी है कि पुनर्गठन और परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर उस तरह का व्यापक विरोध कहीं भी सामने नहीं आया. यह इस बात का संकेत है कि जमीनी स्तर की परिस्थितियों को समझने का प्रयास किया गया.
परिसीमन का पंचायतों और निकायों पर क्या असर होगा?
जब किसी पंचायत या वार्ड की जनसंख्या और क्षेत्र प्रशासनिक रूप से संतुलित होंगे तो जनप्रतिनिधियों और प्रशासन दोनों के लिए काम करना आसान होगा. लोगों की समस्याओं तक पहुंच बेहतर होगी और योजनाओं के क्रियान्वयन में भी सुविधा होगी. हमारा उद्देश्य यही है कि पुनर्गठन का अंतिम लाभ गांव और आम नागरिक तक पहुंचे.
परिसीमन के आगे की क्या प्रक्रिया है?
परिसीमन और पुनर्गठन के बाद निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत अंतिम सीमाओं का प्रकाशन किया जाता है. इसके बाद वार्डों और निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण तथा आरक्षण जैसी प्रक्रियाएं आगे बढ़ती हैं. अंतिम अधिसूचना के बाद संबंधित निर्वाचन प्रक्रिया संचालित की जाती है. हमें खुशी है कि राजस्थान में ये तमाम प्रक्रियाएं शुरू हो चुकी हैं.

परिसीमन का कानूनी आधार क्या है?
राजस्थान पंचायतीराज अधिनियम के तहत पंचायतों के पुनर्गठन और सीमाओं में बदलाव की व्यवस्था है. अधिनियम की धारा 12(2) के तहत ग्राम पंचायतों, धारा 13(2) के तहत पंचायत समितियों और धारा 14(2) के तहत पुनर्गठन और परिसीमन की प्रक्रिया का प्रावधान है. इसी तरह धारा 101 के तहत राज्य सरकार को पंचायतीराज संस्थाओं की सीमाओं में परिवर्तन और बदलाव का अधिकार प्राप्त है. नगरीय निकायों में परिसीमन राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 2009 के प्रावधानों के तहत किया जाता है.
क्या आप मानते हैं कि परिसीमन राजस्थान के पंचायतीराज ढांचे में बड़ा बदलाव साबित होगा?
निश्चित रूप से यह एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया है. राजस्थान बहुत बड़ा राज्य है और यहां भौगोलिक परिस्थितियां भी अलग-अलग हैं. कहीं रेगिस्तान है, कहीं आदिवासी व पहाड़ी क्षेत्र हैं और कहीं घनी आबादी वाले इलाके हैं. ऐसे राज्य में एक संतुलित और व्यावहारिक ढांचा तैयार करना जरूरी है. हमने इसी सोच के साथ ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों और जिला परिषदों के पुनर्गठन पर काम किया है. इसी के चलते राजस्थान में आजादी के बाद पहली बार 3209 ग्राम पंचायतें, 162 पंचायत समितियां, 8 जिला परिषदें और 45 हजार नए वार्ड बने हैं. हमारा प्रयास है कि पंचायतीराज संस्थाएं अधिक प्रभावी हों और विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे.