
आजादी के दिन कुर्सी छीनी, 11 साल बाद छीना इंसाफ?
भाखलिया, डांगावास और गोगुंदा तक एक ही सवाल - क्या राजस्थान में दलितों के लिए आजादी और बराबरी अभी भी सिर्फ कागज पर ही है?
राजस्थान में इन दिनों तीन अलग-अलग जिलों से आई तस्वीरें बेचैन करने वाली हैं. संविधान ने बराबरी का अधिकार तो दे दिया, मगर डांगावास, भाखलिया और गोगुंदा जैसी घटनाएं यह सोचने पर मजबूर कर रही हैं क्या समाज और व्यवस्था ने दलितों को बराबरी से जीने का हक सचमुच दिया है?
भीलवाड़ा के भाखलिया गांव में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सरकारी स्कूल में दलित समाज के लोगों को कथित तौर पर मंच पर कुर्सी पर बैठने से रोका गया और जातिसूचक शब्दों से अपमानित किया गया. वहीं नागौर के डांगावास में 2015 में ट्रैक्टरों से कुचलकर पांच दलितों की हत्या के मामले में 11 साल बाद सभी 40 आरोपियों के सबूतों के अभाव में बरी हो जाने ने सीबीआई की जांच पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. गोगुंदा में पिछले 15 वर्षों से पत्रकारिता कर रहे दलित पत्रकार लखन सालवी पर हमला और जातिसूचक गालियां दिए जाने की घटना भी इस कड़ी की एक और चिंताजनक तस्वीर है.
भले ही ये तीन अलग-अलग जिलों की ये घटनाएं अलग-अलग परिस्थितियों में हुई हों, मगर इनके पीछे छिपी जातिगत मानसिकता और दलितों के सम्मान, सुरक्षा तथा न्याय से जुड़े सवाल एक जैसे हैं.
क्या 15 अगस्त को भी कुर्सी जाति देखकर तय होगी?
बागोर थाने में एफआईआर संख्या 0131/2026 के अनुसार - 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह में भीलवाड़ा के बागोर थाना क्षेत्र के भाखलिया गांव के रामेश्वर लाल बैरवा, गोपाल लाल बैरवा समाज के अन्य लोगों के साथ पहुंचे थे. इस दौरान इनमें से कुछ लोग वहां रखी कुर्सियों पर बैठ गए तो दबंगों को यह नागवार गुजरा. गांव के बालू, हीरालाल, नारायण, रामेश्वर और प्रकाश सहित कुछ लोग वहां आए और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन्हें कुर्सियों से नीचे बैठने के लिए कहा. गोपाल और रामेश्वर ने जब इसका विरोध किया तो उन्हें धमकियां दी गई कि उनके समाज की महिलाओं को आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका के पद से हटा दिया जाएगा और आंगनबाडी बंद कर देंगे. यह पूरा घटनाक्रम स्कूल में शिक्षकों और बच्चों के सामने घटित हुआ.
शिकायत के आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता तथा एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत पांच लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है. इस मामले की जांच मांडल वृत के पुलिस उपाधीक्षक राहुल जोशी को सौंपी गई है. भाखलिया गांव के पूरे मामले में बद्रीलाल बैरवा जैसे जागरूक युवा की भूमिका भी महत्वपूर्ण बन जाती है जिन्होंने घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग की और सामाजिक दबाव के बावजूद मामले को सामने लाने का साहस किया. बद्रीलाल की हिम्मत के कारण ही यह मामला मीडिया की सुर्खियां बना और पुलिस व प्रशासनर को कार्रवाई के लिए बाध्य होना पड़ा.
इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद राजस्थान ही नहीं बल्कि देशभर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है. दलित संगठनों ने इस मामले में दोषी लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं हो इसके लिए सरकार से सख्त कदम उठाने की मांग की है. इस मामले में पूर्व मंत्री एवं भीलवाड़ा जिला देहात कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष रामलाल जाट भी भाखलिया गांव पहुंचे और पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने की मांग की.
डॉ. अंबेडकर वेलफेयर सोसायटी भीलवाड़ा के अध्यक्ष सोहन लाल भोजपुरिया, अखिल भारतीय बैरवा महासभा भीलवाड़ा के अध्यक्ष देवकरण बैरवा व महामंत्री हरीश बैरवा, समाजसेवी हीरालाल बैरवा, भीम आर्मी के जिला संयोजक पंकज डिडवानिया व रामेश्वर लाल बैरवा, बैरवा युवा जागृति सेवा संस्थान सुभाष बैरवा, बैरवा अधिकारी-कर्मचारी सेवा संस्थान के जिला सचिव हरदेव बैरवा, अंबेडकर युवा जागृति समाजिक सेवा संस्थान के जिलाध्यक्ष रामसुख बैरवा, बैरवा युवा ग्रुप आजाद नगर के दीपक बैरवा, एडवोकेट शैतान रैगर, किशनलाल, राजेश बैरवा, राजमल मेघवंशी, पुखराज बैरवा, सामाजिक कार्यकर्ता रतनलाल बैरवा, राकेश बैरवा, रूपालाल बैरवा, सुरेश बैरवा, शिवकुमार बैरवा, भीमराज बैरवा, अर्जुन रैगर, मुकेश मेघवंशी, धर्मराज रैगर, सुभाष बैरवा, बबलू रैगर, मुकेश कुमार बैरवा, बबलू बैरवा ने इस घटनाक्रम पर विरोध जताते हुए दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की. मामले ने तूल पकड़ा तो पुलिस ने चार लोगों को गिरफ्तार कर लिया.
आखिर यह आजादी किसकी और किसके लिए है?
भाखलिया में हुआ कथित जातिगत अपमान केवल दो व्यक्तियों को कुर्सी से उतारने की घटना नहीं है. यह उस मानसिकता का प्रदर्शन है जो आज भी दलितों को सार्वजनिक जीवन में बराबरी और सम्मान के साथ बैठते देखने को तैयार नहीं है. स्वतंत्रता दिवस के दिन, वह भी एक सरकारी विद्यालय में, यदि किसी नागरिक की जाति देखकर उसकी कुर्सी तय की जाती है तो यह हमारे लोकतंत्र और संविधान के लिए बेहद शर्मनाक स्थिति है. भारत की आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजी शासन से मुक्ति नहीं था. आजादी का अर्थ हर नागरिक को बराबरी, सम्मान, गरिमा और भयमुक्त जीवन का अधिकार मिलना भी था. अगर 15 अगस्त को ही किसी दलित नागरिक से कहा जाता है कि तुम कुर्सी पर नहीं बैठ सकते तो हमें यह पूछना होगा कि आखिर आजादी किसकी और किसके लिए है?”
"संविधान ने जिस बराबरी को नागरिक अधिकार बनाया है, जातिगत मानसिकता से ग्रसित लोग सामाजिक जीवन में दलितों से यह अधिकार भी छीन लेना चाहते हैं.’’
डांगावास में 11 साल बाद भी सवाल जिंदा :
राजस्थान में भाखलिया की घटना नई है. राजस्थान में हर दिन गाहे-बगाहे इस तरह की घटनाएं सामने आती रहती हैं. एक ऐसा ही मामला नागौर के डांगावास में 14 मई 2015 को घटित हुआ था जहां भूमि विवाद के दौरान हुए हिंसक हमले में पांच दलितों को ट्रेक्टर्स से कुचलकर मौत के घाट उतार दिया गया. इस दौरान छह लोगों की मौत हुई और कई लोग घायल हुए थे. पूरे देश में सरकारर की किरकिरी हुई तो इसकी सीबीआई को जांच सौंपी गई मगर विडंबना देखिए कि गत 5 अगस्त 2026 को मेड़ता की एससी-एसटी विशिष्ट अदालत ने सीबीआई की जांच में आरोपी बनाए गए सभी 40 लोगों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया. मृतकों के परिजनों के लिए वह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि ऐसा जख्म है जो 11 साल बाद भी हरा है. अदालत ने अपने फैसले में अभियोजन के गवाहों के बयानों और दस्तावेजों में विरोधाभास का हवाला और आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया. कानून की अपनी कसौटी है और अदालत का फैसला उसका हिस्सा है मगर अदालत से बाहर खड़ा एक सवाल भी उतना ही बड़ा है कि 40 में से कोई भी दोषी नहीं है तो फिर पांच लोगों की हत्या आखिर किसने की?
पीड़ित परिवार के किशनाराम मेघवाल का यह सवाल सिर्फ उनका निजी दर्द नहीं है, बल्कि उस न्याय व्यवस्था के सामने खड़ा सवाल है जिसके दरवाजे पर उनका परिवार 11 साल से दस्तक दे रहा है. डांगावास की कहानी सिर्फ अदालत के फैसले पर खत्म नहीं होती. सरकार ने भी डांगावास पीडि़तों के साथ कदम कदम पर अन्याय किया है. तत्कालील सरकार ने घटना के बाद मृतकों के परिजनों को 25-25 लाख रुपए, घायलों को 10-10 लाख रुपए और मृतकों के परिवार से एक-एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने का आश्वासन दिया गया था, मगर पीड़ित परिवारों के अनुसार 11 साल बाद भी ये वादे पूरे नहीं हुए. पीड़ित पक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जांच में कमियों पर सवाल उठाए हैं और प्रशासन, अभियोजन तथा जांच एजेंसियों की भूमिका को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज की हैं.
अगर 40 लोग निर्दोष तो नरसंहार का दोषी कौन
‘’ पांच लोगों को ट्रैक्टर से कुचलकर मौत के घाट उतार दिए जाने के इस नरसंहार पर अदालत का जो फैसला आया है, वह न्याय प्रणाली से भरोसा तोड़ने वाला है. डांगावास की घटना केवल एक भूमि विवाद नहीं, बल्कि सामंती मानसिकता और जातिगत वर्चस्व की भयावह अभिव्यक्ति थी. 11 वर्षों के लंबे ट्रायल के बाद आया यह फैसला सामाजिक न्याय की नींव पर सीधा आघात है और यह गंभीर प्रश्न खड़ा करता है कि यदि कानून की नजर में सभी 40 आरोपी निर्दोष हैं, तो फिर 6 नागरिकों का नरसंहार किसने किया?"
ओर गोगुंदा से भी आई वैसी ही तस्वीर :
तीसरी घटना 19 अगस्त को उदयपुर के गोगुंदा तहसील में सामने आई जब दलित पत्रकार लखन सालवी एसडीएम को ज्ञापन देने आए लोगों से बातचीत व कवरेज करने के लिए वहां आए थे. एसडीएम कार्यालय के बाहर जब वो ग्रामीणों से उनकी समस्याओं पर बातचीत कर रहे थे तभी एक कथित पत्रकार वहां आया और लखन सालवी के काम में बाधा डालने लगा. सालवी ने जब उसे रोका तो उसने मारपीट और जातिसूचक गालियां निकालनी शुरू कर दी. वहां खड़ा लोगों ने लखन को बचाकर तहसील कार्यालय के बरामदे में ले आए तो कथित पत्रकार वहां भी पहुंच गया और किसी नुकीले हथियार से सालवी के सिर और मुंह पर वार कर दिया. वहां मौजूद लोगों ने बीच-बचाव कर लखन को छुड़ाया और लहूलुहान हालत में अस्पताल लेकर गए. अस्पताल में जब चिकित्सक लखन के मरहम पट्टी कर रहे थे तभी कथित पत्रकार अपने भाई के साथ वहां पहुंचा और चिकित्सा स्टाफ की मौजूदगी में फिर मारपीट करने लगा.
बताया जाता है कि लखन सालवी पर हमला करने वाला कथित पत्रकार उनके ही संस्थान में काम करता है तथा आपराधिक और जातिवादी छवि का है. सालवी को वह पिछले काफी दिन से परेशान कर रहा था जिसकी शिकायत उन्होंने गोगुंदा पुलिस थाने और उदयपुर पुलिस अधीक्षक कार्यालय में भी दी थी मगर कोई कार्रवाई नहीं हुई.
सालवी कहते हैं – ‘‘पुलिस अगर समय पर कार्रवाई करती तो आज उस पत्रकार की मुझ पर हमला करने की हिम्मत नहीं होती.’’
पुलिस-प्रशासन व कानून को अब इन घटनाओं को सिर्फ कानून-व्यवस्था की अलग-अलग घटनाएं मानकर आगे नहीं बढ़ना चाहिए. भाखलिया की कुर्सी, डांगावास की मौतें और गोगुंदा में लहूलुहान पत्रकार, तीनों मिलकर व्यवस्था से एक कठोर सवाल पूछ रहे हैं कि क्या दलितों के लिए बराबरी केवल संविधान की किताबों में सुरक्षित है या उसका सम्मान समाज और सत्ता की जमीन पर भी सुनिश्चित किया जाएगा?
आजादी के 80 साल बाद भी अगर स्वतंत्रता दिवस के मंच पर किसी की कुर्सी जाति देखकर तय होती है, अगर छह लोगों की मौत के बाद 11 साल तक परिवार जवाब तलाशते रहते हैं और अगर अपनी बात कहने वाला दलित पत्रकार ही सुरक्षित नहीं है, तो सवाल केवल इन तीन घटनाओं का नहीं रह जाता. सवाल उस आजादी का है जिसका वादा बराबरी, गरिमा और न्याय के साथ किया गया था.
