
किसका, कितना हक ?
नगरीय निकाय चुनावों में आरक्षण पर तकरार
अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग की रिपोर्ट ने राजस्थान में सियासी घमासान मचा दिया है. इस रिपोर्ट में ओबीसी की आबादी का आंकड़ा क्या बदला, उसके साथ ही गांव की सत्ता में हिस्सेदारी का पूरा गणित बदलने की आशंका पैदा हो गई है. छह-सात साल पहले इसी आयोग की रिपोर्ट में प्रदेश में ओबीसी की आबादी करीब 52 फीसदी बताई गई थी मगर अब निकाय व पंचायत चुनाव के लिए पूर्व न्यायाधीश मदनलाल भाटी की अध्यक्षता में गठित ओबीसी राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग की रिपोर्ट में यह आंकड़ा घटकर करीब 43 फीसदी यानी लगभग 3.59 करोड़ रह गया है. कागज पर आबादी में करीब नौ प्रतिशत की इस कमी का सीधा असर पंचायतीराज और नगरीय निकायों में ओबीसी के लिए आरक्षित होने वाली सीटों पर पड़ने वाला है. नगरीय निकाय चुनाव की आरक्षण लॉटरी से इसकी शुरुआत हो गई है. सूबे के 309 नगरीय निकायों में ओबीसी के लिए अगर उसके हिस्से का 21 फीसदी आरक्षण तय किया जाता तो 65 निकाय ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित किए जाने थे मगर आरक्षण लॉटरी में ओबीसी के हिस्से 60 निकाय यानी, 19.41 फीसदी आरक्षण मिला है. कुछ ऐसा ही हाल पंचायतीराज संस्थाओं के आरक्षण में भी नजर आया है. जिला परिषद् और पंचायत समितियों के वार्डों का आरक्षण भी 15 से 20 फीसदी के बीच ही झूलता रहा है. इसका विरोध हुआ तो ग्राम पंचायतों के सरपंच औा वार्ड पंचों की आरक्षण की लॉटरी निकालने का काम एक माह आगे खिसका दिया गया है. सरपंच और वार्ड पंच के आरक्षण की लॉटरी अब 18 सितंबर को निकाली जाएगी.
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि ओबीसी की आबादी 52 से 43 फीसदी कैसे हो गई. बड़ा सवाल यह है कि जब प्रदेश में जातिवार जनगणना हुई ही नहीं, तब नई रिपोर्ट में आबादी का यह आंकड़ा निकाला कैसे गया? जिस सर्वे को आरक्षण का आधार बनाया जा रहा है, उसकी पहुंच कितनी थी, कितने परिवारों तक टीमें पहुंचीं, कितने परिवार छूट गए और जातिवार आंकड़े जुटाने की पद्धति क्या रही - इन सवालों के जवाब अब राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं. ओबीसी की आबादी को 52 फीसदी बताने वाला आंकड़ा राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के वर्ष 2019 के आकलन से जुड़ा है. उस समय तत्कालीन कांग्रेस सरकार की ओर से अति पिछड़ा वर्ग यानी एमबीसी को पांच फीसदी आरक्षण देने के लिए विधानसभा में संशोधन विधेयक पेश किया गया था. उस दौर में सरकारी रिकॉर्ड में ओबीसी की आबादी करीब 52 फीसदी बताई गई थी.
अब वर्ष 2026 में ओबीसी राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग की नई रिपोर्ट में यही आबादी करीब 43 फीसदी बताई गई है. यानी छह-सात साल में सरकारी आंकड़ों में ओबीसी की हिस्सेदारी करीब नौ प्रतिशत कम हो गई. यह अंतर सामान्य जनसंख्या वृद्धि या कमी से समझ में आने वाला नहीं है. इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ओबीसी की वास्तविक आबादी कम हुई है या आंकड़े जुटाने का तरीका बदल गया है? नई रिपोर्ट में ओबीसी आबादी करीब 3.58-3.59 करोड़ बताई गई है. रिपोर्ट में 92 ओबीसी जातियों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अध्ययन किए जाने की बात सामने आई है. ओबीसी संगठनों और विपक्ष का सवाल है कि यदि पिछली बार सरकारी स्तर पर 52 फीसदी का आंकड़ा स्वीकार किया गया था तो अब नौ फीसदी का अंतर किन ठोस कारणों से आया? सरकार और आयोग को दोनों आंकड़ों के बीच अंतर की वैज्ञानिक और सार्वजनिक व्याख्या करनी होगी. विवाद इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह महज आंकड़ों की रिपोर्ट नहीं है. इसी रिपोर्ट के आधार पर तय होने वाला आरक्षण आने वाले पंचायतीराज और नगरीय निकाय चुनावों में जिला प्रमुख, प्रधान, सरपंच, मेयर, नगर पालिका अध्यक्ष से लेकर वार्ड सदस्य तक की राजनीतिक संभावनाएं बदल सकता है.
जनगणना नहीं हुई तो आबादी का आंकड़ा कैसे निकला?
नई रिपोर्ट का सबसे संवेदनशील पहलू यही है कि यह आंकड़ा नियमित जातिवार जनगणना से नहीं आया है. आयोग ने सर्वे और विभिन्न मानकों के आधार पर ओबीसी परिवारों की स्थिति का आकलन किया है. उपलब्ध जानकारी के अनुसार करीब 74.85 लाख ओबीसी परिवारों का सर्वे किया गया और 19 अलग-अलग मानकों के आधार पर जानकारी जुटाई गई. आयोग की रिपोर्ट करीब 900 पन्नों की बताई जा रही है और इसमें ओबीसी की 92 जातियों की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति का अध्ययन किया गया है. आयोग का दावा है कि उसने ग्राउंड लेवल पर काम किया और सभी जातियों को फोकस में रखा. आयोग के अध्यक्ष मदन सिंह भाटी का कहना है कि जिन जातियों की राजनीतिक और आर्थिक हिस्सेदारी नगण्य रही है, उन्हें प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए विशेष प्रावधान और नीतिगत प्रयास जरूरी हैं मगर विपक्ष इस सर्वे की व्यापकता और उसकी विश्वसनीयता को लेकर सरकार पर हमलावर है.
‘‘सरकार ने ओबीसी आरक्षण 21 प्रतिशत से कम कर 13-14 प्रतिशत तक सीमित कर दिया है. किसी गांव में सर्वे टीम नहीं पहुंची, किसी परिवार का नाम सर्वे में दर्ज नहीं हुआ और न अभी तक 2026 की जनगणना के जातिगत आंकड़ें जारी हुए हैं तो फिर आयोग ने ओबीसी की आबादी का कैसे निर्धारण कर लिया. सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ओबीसी आरक्षण तय करने के क्या मापदंड अपनाए गए’’ॽ
‘‘दौसा के 100 गांवों में आयोग की टीम का कोई प्रतिनिधि नहीं पहुंचा और न ही ओबीसी आबादी का सर्वे हुआ तो फिर ऑफिस में बैठकर इस तरह के मनगढंत आंकड़े कैसे जारी हो गए’’ॽ
आयोग ने ओबीसी की आबादी के आकलन के जो तर्क दिए हैं उसके अनुसार प्रदेश से बड़ी संख्या में लोग दूसरे राज्यों में पलायन कर चुके हैं. ऐसे में इन परिवारों की जानकारी जुटाना आसान नहीं था. दूसरी ओर सर्वे के दौरान उपजातियों को मुख्य जाति के रूप में दर्ज किए जाने की समस्या की बात भी सामने आई है. इस पूरे विवाद में दो दौर के ओबीसी आयोग से जुड़े अधिकारियों के बयान भी महत्वपूर्ण हैं. वर्ष 2019 के ओबीसी आयोग के तत्कालीन सदस्य सचिव हरी कुमार गोदारा का कहना है – ‘’ उस समय आयोग ने अनुमान के आधार पर काम किया था. इसमें वर्ष 2011 के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण सहित कई पैरामीटर को शामिल किया गया था और मंडल कमीशन की वर्किंग के आंकड़ों को भी ध्यान में रखा गया था. बाद में ओबीसी सूची में कुछ जातियां भी जोड़ी गई हैं.’’
दूसरी ओर वर्तमान ओबीसी राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग के सदस्य सचिव अशोक जैन का कहना है – ‘’ओबीसी परिवारों की गणना के लिए कई पैरामीटर इस्तेमाल किए गए हैं और जनाधार कार्ड की गणना प्रमुख आधार रही है. उनके अनुसार आयोग ने जो आंकड़े जुटाए हैं, वे सरकार को भेज दिए गए हैं और ये आंकड़े अनुमानित हैं’’
काबिलेगौर है कि स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण सुप्रीम कोर्ट के 'ट्रिपल टेस्ट' की व्यवस्था के तहत तय किया जाता है. ऐसे में आंकड़ों का यह विवाद सीधे आरक्षण से जुड़ता है. सुप्रीम कोर्ट की ट्रिपल टेस्ट व्यवस्था के अनुसार निकाय व पंचायतीराज संस्थाओं में आरक्षण निर्धारित करने के लिए राज्य को एक समर्पित ओबीसी आयोग बनाना होगा. आयोग को यह अध्ययन करना होगा कि स्थानीय राजनीति में ओबीसी का प्रतिनिधित्व पर्याप्त है या नहीं. इसके बाद ग्राम पंचायत, पंचायत समिति, जिला परिषद और नगरीय निकायों के स्तर पर राजनीतिक पिछड़ेपन का आंकलन किया जाना है. साथ ही एससी, एसटी और ओबीसी का कुल आरक्षण 50 फीसदी की सीमा के भीतर रखना होता है. ओबीसी आयोग की रिपोर्ट में ओबीसी में शामिल सभी 92 जातियों की सामाजिक, राजनीतिक और सरकारी सेवा संबंधी भागीदारी का अध्ययन किया है. इसके अनुसार ओबीसी की 92 जातियों में से केवल 7 जातियों की कुल आबादी मिलाकर 55% से अधिक हो जाती है, जबकि शेष 85 जातियां 45% हिस्सेदारी में सिमटी हुई हैं. आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक आबादी के मामले में जाट और जट सिख समाज ओबीसी वर्ग में सबसे बड़े समूह के रूप में उभरा है. दूसरे स्थान पर गुर्जर, तीसरे पर कुम्हार-कुमावत, चौथे पर माली-सैनी, पांचवें पर जांगिड़, छठे पर यादव और सातवें स्थान पर मेव समाज आता है. आयोग की रिपोर्ट के अनुसार ओबीसी की इन 92 जातियों में से करीब 11 जातियां ऐसी हैं, जिनका स्थानीय निकायों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत अधिक है वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में जातियों की राजनीतिक हिस्सेदारी नगण्य है. रिपोर्ट में जाट, गुर्जर, कुंभार-प्रजापत, माली-सैनी, जांगिड़, यादव और मेव जैसी जातियों की आबादी का अलग-अलग आंकड़ा दिया गया है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार ओबीसी आबादी में जाटों की हिस्सेदारी करीब 20.14 फीसदी, गुर्जरों की 9.11 फीसदी, कुंभार-प्रजापत की 8.36 फीसदी, माली-सैनी की 7.80 फीसदी, जांगिड़ की 3.49 फीसदी, यादव की 3.22 फीसदी और मेव की 3.02 फीसदी बताई गई है. काबिलेगौर है कि राजस्थान में ओबीसी श्रेणी में शामिल 92 जातियों के लिए पंचायतीराज व नगरीय निकाय संस्थाओं में 21 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया है.
कम आबादी के क्या परिणाम होंगेॽ
ओबीसी आयोग की रिपोर्ट में आबादी कम होने का सीधा असर ओबीसी जातियों के आरक्षण पर होगा. मान लीजिए किसी पंचायत में वास्तविक ओबीसी आबादी 50 फीसदी है, मगर उपलब्ध सरकारी आंकड़ों में वह 30 फीसदी दर्ज हो जाती है. ऐसे में रोटेशन और आरक्षण की प्रक्रिया के दौरान उस पंचायत के ओबीसी के लिए आरक्षित होने की उतनी ही कम हो जाएगी. यदि आबादी का आंकड़ा कम हुआ तो केवल प्रतिशत कम नहीं होगा. आरक्षित सीटों का हिस्सा और वार्ड की श्रेणी भी बदल जाएगी.
ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को लेकर छिड़े इस विवाद को खत्म करने का पारदर्शिता ही सबसे बेहतर रास्ता है. सरकार और आयोग को रिपोर्ट के साथ यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि सर्वे में कुल कितने परिवार शामिल हुए, किस जिले में कितने परिवार दर्ज हुए, कितने परिवार सर्वे से बाहर रहे, जातिवार आंकड़े कैसे तैयार किए गए और 2019 के 52 फीसदी के आंकड़े तथा 2026 के 43 फीसदी के आंकड़े में अंतर के पीछे वास्तविक कारण क्या हैं.’’
यूं घट गया आरक्षण :
प्रदेश की 41 जिला परिषद और उनके 1403 वार्डों में ओबीसी के लिए 192 वार्ड यानी, 13.68 फीसदी ही आरक्षित किए गए हैं जबकि 21 प्रतिशत आरक्षण के हिसाब से ओबीसी के लिए 294 वार्ड आरक्षित होने चाहिए थे. इसी तरह राजस्थान की 457 पंचायत समितियों के 8245 वार्डों में ओबीसी के लिए 1101 वार्ड आरक्षित हुए हैं जो 13.35 प्रतिशत है. ओबीसी के 21 प्रतिशत आरक्षण के हिसाब से 1731 वार्ड ओबीसी के लिए आरक्षित होने चाहिए थे. काबिलेगौर है कि राजस्थान में ओबीसी, एससी और एसटी को पंचायतीराज व नगरीय निकायों में उसकी जनसंख्या के आधार पर 21, 16 और 12 फीसदी आरक्षण दिए जाने का प्रावधान है मगर राजस्थान में अलग-अलग जिलों के सामने आए आंकड़े चौंकाने और सरकार के मनमाने रवैए को दर्शा रहे हैं. अजमेर, डीग, ब्यावर, खैरथल-तिजारा, कोटपूतली-बहरोड, जैसलमेर, झुंझुनूं और फलोदी सहित राजस्थान के कई जिले ऐसे हैं जहां एससी-एसटी और ओबीसी को उनके हिस्से के 49 फीसदी की जगह महज 35-40 फीसदी तक आरक्षण दिया गया है. अजमेर में एससी-एसटी और ओबीसी का कुल आरक्षण 39.9 फीसदी, ब्यावर में 33.3 फीसदी, डीग में 34.48, जैसलमेर में 38, झुंझुनूं में 39, खैरथल-तिजारा में 36, कोटपूतली-बहरोड़ में 37 और फलोदी में 39.13 फीसदी आरक्षण दिया गया है. अगर अकेले ओबीसी आरक्षण की बात करें तो अलवर, चित्तौड़गढ़, दौसा, करौली और श्रीगंगानगर जिलों में ओबीसी के लिए आरक्षित सीटें महज 9.9 फीसदी हैं वहीं डीडवाना-कुचामन, पाली, फलोदी और राजसमंद जिलों में 21 फीसदी की जगह महज 11.11 फीसदी सीटें ओबीसी के लिए रिजर्व रखी गई हैं. सवाल सीधा है..जब 50 फीसदी की सीमा के भीतर इन वर्गों को अधिक प्रतिनिधित्व देने की गुंजाइश थी, तो इन जिलों ओबीसी, एससी और एसटी की हिस्सेदारी 40 फीसदी से भी नीचे क्यों सिमट गईॽ यह आरक्षण की नीति है, या सामाजिक न्याय के अधिकारों को सीमित करने की सोची-समझी रणनीति? सरकार को हर जिले में तय किए गए आरक्षण का स्पष्ट और तार्किक आधार सार्वजनिक करना चाहिए.
| जिला | आरक्षण |
|---|---|
| अजमेर | 39.9 |
| बालोतरा | 41.94 |
| बाड़मेर | 43.24 |
| ब्यावर | 33.35 |
| चूरू | 46.75 |
| डीग | 34.48 |
| डीडवाना-कुचामन | 42.85 |
| झुंझुनूं | 38.00 |
| खैरथल-तिजारा | 39.03 |
| कोटपूतली-बहरोड | 36.73 |
| फलोदी | 39.13 |
| सीकर | 40.80 |
